हे पृथ्वीलोक के वासीयों पारिजात की महिमा समझो !

आज मेरा आत्मराम आपको पारिजात के बारे में बताने के लिए प्रसन्नता से उत्सुक हुआ है। हरिवंश पुराण में जिसे इच्छा पूर्ण करने वाला वृक्ष कहा है,वो यही पारिजात है । पारिजात के फ़ूल मध्यरात्रि को खिलकर सुबह तक तो झड़ जाते है । समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी,ऐरावत,गंगा आदि के साथ-साथ पारिजात भी उत्पन्न हुआ था । रुक्मणि और सत्यभामा दोनों इस पारिजात के वृक्ष को अपने-अपने आंगन में चाहते थे, बाद में श्रीकृष्ण ने इसे सत्यभामा के बगीचे में इस तरह से बोया के उसके फ़ूल रुक्मणि के बगीचे में झड़ते थे । ऐसा भी कहा जाता है कि अर्जुन अपनी माता कुन्ती के लिए यह वृक्ष इन्द्र के पास से ले आए थे और माता कुन्ती प्रतिदिन एस पारिजात के पुष्पों से शिवजी की पूजा करती थी । पारिजात को ‘a sad tree’ या ‘tree of sorrow’ भी कहा गया है क्योंकि ये आधी रात को खिलकर सुबह जल्दी, सवेरे तक सारे फ़ूल इसके झड़ जाते है ।

इस बात के पीछे एक दन्त कथा भी है पारिजातक नाम की एक राजसुंदरी थी । वो भगवान सूर्यनारायण के प्रेम में थी । सूर्य का दिल जीतने के लिए उसने काफी सरे प्रयत्न किए थे लेकिन वो विफल रही तब अत्यंत विरह व्यथा से व्याकुल होकर उसने देहोत्सर्ग कर लिया आत्महत्या कर ली । उसकी राख में से इस पारिजात का जन्म हुआ । उसकी जहाँ कब्र हुई उसी जगह ये पेड़ प्रगट हुआ । वह स्थान उत्तरप्रदेश में बाराबंकी के पास है 28 की.मी. दूर किन्तूर नाम का यह जगह है, यह स्थान है । प्रेमियों की नजर वह सहन नहीं कर सकती थी इसलिए रात को ही खिलकर सुबह तक में अपने सारे फूलों को वो आँसुओ की नाई झरा देती थी । रात होते ही पारिजात की मीठी महक हमारे आसपास के समग्र माहौल को महका देती है और मन को खुशनुमा बना देती है । तो मंधार कहो या पारिजात या फिर कल्पवृक्ष एक ही बात है क्योंकि श्रद्धालुजन पारिजात वृक्ष के नीचे शाम को चादर बिछा देते है ताकि फूल जमीन पर न गिरे । चादर पर गिरे । सुबह उन फूलों को उठवाकर भगवान को चढ़ाया जाय । वे मानते हैं कि जमीन पर गिरे हुए फूल ईश्वर को कैसे चढ़ाया जाय । लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि पारिजात के फूल धरती पर गिरकर, मिट्टी की खुशबू को भी अपने साथ मिला लेते होंगे । मिट्टी की भी तो अपनी महिमा है । पहली बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू क्या कभी ली है आपने ? कितनी सुंदर महक आती है । एक कवि ने लिखा है –
“बारिशों में कभी महकता नहीं, मुझे ऐसा पक्का आंगन नही चाहिए ।”
तो चंदन को घिसते-घिसते समय दो-चार पारिजात के फूलों की केसरिया डंठले उसमें मिला दोगे तो वाह ! क्या बात है । उसकी सुगंध में एक लहेजत पैदा होगी । कभी करके देखियेगा । पारिजात की केसरी डंठल का उपयोग सिल्क या कॉटन कपड़े की डाई में भी होता है । इस तरह से डाई किये हुए भगवे वस्त्र बौद्ध साधु पहनते है, ऐसा सुना है । पारिजात के फूल उसकी सुगंध के कारण अगरबत्ती या इत्र में भी उपयोग किये जाते है पर पारिजात के पत्तों का भी बड़ा औषधीय उपयोग है । इसका मूल्य है । ये पत्ते appetizer भी है । पेट, कब्ज या चमड़ी के रोगों में भी उपयोगी है । तो वैद्यराज विस्तार से बता पाएँगे । पारिजात का एक नाम मंधार भी है । इसका बंगाली नाम सेथाली है । उत्तरप्रदेश के बाराबंकी के पास एक गाँव है किन्तूर, एक किन्तूर में पारिजात का विशाल वृक्ष है और उसके साथ अनेकों लोगों की आस्था भी जुड़ी है । इस पारिजात के स्पर्शमात्र से थकान उतर जाती है । उत्तरप्रदेश के बाराबंकी से 38 किलोमीटर दूर किन्तूर के पारिजात का विशाल वृक्ष है किन्तूर में, जिसका नामकारण पांडवों की माता कुंती के नाम से पड़ा । कहा जाता है कि पांडवों ने अपनी माता कुंती के साथ यहाँ पर अज्ञातवास के दौरान समय बिताया था । मान्यता ऐसी भी है कि इंसान चाहे कितना भी थका हुआ क्यों न हो लेकिन यहाँ के पारिजात वृक्ष के स्पर्शमात्र से उसकी सारी थकावट दूर हो जाती है । तो सामान्यरूप से पारिजात वृक्ष 10 फीट से लेकर 25 फीट तक का होता है, लेकिन यहाँ किन्तुर में जो पारिजात है वो 45 फीट ऊँचा है और 50 फीट का उसका घेराव है और दूसरी विशेषता यह है कि इस पर कभी बीज नहीं आते, इसके अलावा इस वृक्ष की कलम लगाने से भी नहीं लगती है । इसकी कलम से दूसरा वृक्ष नहीं लगता है । वैज्ञानिकों ने काफी प्रयास करके देखा लेकिन आजतक उनको विफलता ही मिली है । उसका दूसरा वृक्ष बनाने में वे असफल रहे हैं तो हर साल जून महीने के आसपास इस पारिजात वृक्ष पर खुबसूरत सफ़ेद रंग के केसरिया डंठल वाले फूल लगते हैं और केवल रात्रि के दौरान खिलनेवाले यह फूल सुबह होते-होते नीचे झड़कर गिर जाते हैं और इसके फूल ही पूजा में उपयोग किये जाते हैं । इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में काफी महत्व है । यहाँ एक बात ख़ास है कि पारिजात के वृक्ष के नीचे झड़कर गिर जाने वाले फूल ही पूजा में उपयोग किये जाते हैं, बाकी पेड़ पर से फूल तोड़ने की मनाई है । तो हरिवंश पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष की उपाधि दी गयी है । इसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी और बाद में इसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थापित किया था । पुराणों के अनुसार पारिजात के स्पर्शमात्र से देव नर्तकी उर्वशी की थकान पलभर में दूर हो जाती थी । एक बार देवऋषि नारदजी पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए पहुँचे तो वो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प लेकर गये और वे पुष्प इतने सुन्दर, मनोहर, सुगंधित कि श्रीकृष्ण के चरणों में उन्होंने यह फूल अर्पित कर दिए और कृष्ण ने वो फूल अपने पास में बैठी हुई अर्धांगिनी रुक्मिणी जी को दे दिए ।

लेकिन जब श्री कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा आई और उसे पता चला कि स्वर्ग लोक में से आए हुए पारिजात के फूलों को प्रभु ने रुक्मणी को भेंट दे दिए, तब उसे क्रोध आया कि मुझे नहीं मिले । परिणाम स्वरूप छोटे बच्चे की तरह वह जिद पकड़ कर बैठ गई कि मुझे भी अपनी वाटिका के लिए पारिजात का वृक्ष चाहिए । श्री कृष्ण ने अनेकों बार समझाने की कोशिश की लेकिन सत्यभामा समझी नहीं और अपने निर्णय पर अडिग रही कि कुछ भी करो लेकिन मुझे ऐसे फूल दो…पारिजात का पेड़ ही दो ! अंत में सत्यभामा की ज़िद के समक्ष श्री कृष्ण झुक गए और कृष्ण ने अपने दूत को आदेश दिया कि जाओ स्वर्गलोक में और पारिजात का वृक्ष लेकर आओ । उनके इंद्र तो बड़े हठीले और जिद्दी ठहरे उन्होंने पारिजात देने से मना कर दिया । दूत ने धरतीलोक पर आकर कृष्ण को बताया । अंत में कृष्ण ने इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात का वृक्ष धरती पर ले आए । श्री कृष्ण से रूठकर इंद्र ने पारिजात को श्राप दिया कि तू फल से विहीन हो जाएगा । तब से पारिजात फल विहीन हो गया ऐसा माना जाता है । तो श्री कृष्ण ने सत्यभामा की वाटिका में पारिजात का रोपण किया लेकिन सत्यभामा को पाठ पढ़ाने के लिए उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि पारिजात के पेड़ पर जितने भी फूल गिरे वे रुकमणी की वाटिका में इकट्ठे होते , यह कारण था कि पारिजात के पेड़ के नीचे फूल नहीं गिरते थोड़े दूर इकट्ठे होते थे । इसके बाद जब पांडवों ने किनपुरी में अज्ञातवास किया उस समय माता कुंती के लिए उन्होंने भगवान शिव के मंदिर की स्थापना की । यह अभी भी, वर्तमान में भी कुंतेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है । अभी भी वहाँ पर स्थित है । यह उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के 38 किलोमीटर दूर कुंतेश्वर महादेव नाम का मंदिर है । कहा जाता है कि माता कुंती हर रोज पारिजात के फूलों से नित्य पूजा कर सके इस उद्देश्य से पांडवों ने सत्यभामा की वाटिका से पारिजात के वृक्ष को यहाँ पर लाकर स्थापित किया था ।

तो तभी से यह पेड़ यहाँ पर होने की मान्यता है । पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है । उसके फूल और पत्ते और छिलके का उपयोग औषधि बनाने में किया जाता है । पारिजात के पत्तों का उपयोग सायटिका के रोग को दूर करने के लिए भी होता है । इसके फूलों का हृदयरोग संबंधित व्याधियों में भी उत्तम प्रभाव माना गया है । वर्ष में एक बार पारिजात वृक्ष पर आने वाले फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदयरोग के हमलों से बचा जा सकता है और इसके पत्तों को पीसकर शहद के साथ सेवन करने से सूखी खाँसी मिट जाती है । उसे त्वचा पर लगाने से चर्मरोग मिटता है । त्वचा संबंधी रोग दूर होते हैं और पारिजात के कोपलों का उपयोग स्त्री रोगों की चिकित्सा में भी होता है । इसके बीजों का इस्तेमाल बालों के लिए खूबसूरत बनाने में होता है । पत्तों का जूस चाहे जैसे भी क्रोनिक तत्व को भी मिटा देने की क्षमता रखता है । तो, स्वर्ग का यह वृक्ष पारिजात कितना महत्वपूर्ण है, कितना दिव्य है, मोहक है, ताजगी प्रदान करने वाला है, थकान मिटाने वाला है, यह मैंने मेरी जिंदगी के इतने सालों में पहली बार पढ़ा तो यह जानकारी आप तक पहुँचाना मैंने उचित समझा चाहे इसे मंधार कहो, चाहे पारिजात कहो, कल्पवृक्ष कहो, हरसिंगार कहो, ये अलग-अलग नाम है लेकिन हैं तो यह एक ही वृक्ष । इसमें इसकी महिमा को समझकर आप भी उसका फायदा लें ।
ॐ आनंद… ॐ शांति… ॐ माधुर्य…
ॐ कल्याणं अस्तु…
शुभमस्तु…

– नारायण साँई

प्रस्तुति – Global Organization For Promotion of Nobel Thoughts and Deeds

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