World Health Day – सर्वे सन्तु निरामयाः !
सर्वे सन्तु निरामयाः !
गुजरात के प्रसिद्ध व सेवा का व्रत लिए स्वास्थ्य मंदिर… जहाँ नि:शुल्क या बहुत कम रूपयों में नॉमिनल चार्ज लेकर लोगों का इलाज किया जाता है ।
गुजरात में ऐसे 100 अस्पताल या आरोग्य मंदिर होंगे यहाँ कुछ नाम दिए जा रहे हैं ।-पूज्य श्री नारायण साँईं जी
1 ) सूरत जनरल हॉस्पिटल – डॉ. भट्ट का हॉस्पिटल
2 ) यू. एन. एम. हॉस्पिटल – बच्चों के रोगों के लिए ।
3 ) डॉ. शिवानंद अध्वर्यु – आंखों का हॉस्पिटल, वीरनगर / नि:शुल्क नेत्र ऑपरेशन भावनगर – राजकोट – रोड
4 ) रामकृष्ण मिशन, राजकोट द्वारा संचालित – कैंसर हॉस्पिटल और सत्य साँईं हार्ट हॉस्पिटल
5 ) अहमदाबाद की ठाकरशी ट्रस्ट द्वारा संचालित जे एस एन हॉस्पिटल मरणासन्न मरीजों को रखने – संभालने का कार्य करता है ।
6 ) निर्दोषानंद हॉस्पिटल, गाँव : – टींबी, भावनगर – धोला से उमराला जाने वाले रास्ते पर इलाज नि:शुल्क, मरीज और उसके परिजन को मुफ्त में रहने – खाने की सुविधा
7 ) डॉ. कन्हुभाई कलसरिया सद्भावना हॉस्पिटल, महुबा रोड भावनगर, तथा कलसर गाँव में
8 ) आर. एम. एस. हॉस्पिटल, धंधुता
9 ) सहयोग कुष्ठ रोग ट्रस्ट, राजेन्द्रनगर, हिम्मतनगर – शामलाजी रोड पर सुरेश सोनी द्वारा संचालित
10 ) सेवा रूरल, झगड़िया – डॉ. अनिलभाई, लताबेन अमेरिका से लौटकर सेवा में लगे
11 ) एच. सी. एफ. अहमदाबाद (हेल्थ केयर फाउंडेशन) जुहापुरा, गुप्तानगर, जीवराज पार्क, राजीवनगर, पश्चिम क्षेत्र में
12) डॉ. भारत – फुल बॉडी चेकअप 600 रुपये
आजकल समाचार पत्रों में कुछ अस्पतालों में गलत ऑपरेशन किए गए, कुछ अस्पतालों में मरीजों से अधिक धन वसूला गया, कुछ में स्वास्थ्य बीमा में घोटाले हुए – ऐसे समाचार और शिकायतें देखने को मिलती हैं ।
इससे ऐसा आभास होता है कि आधुनिक स्वास्थ्य सेवा में हर ओर अव्यवस्था ही चल रही है । स्वास्थ्य संस्थाएं मरीजों को ठीक करने में नहीं, बल्कि पैसे कमाने में रुचि रखती हैं । ऐसा लगता है जैसे उन्हें केवल धन वसूलने में ही दिलचस्पी है । परंतु इस संसार में जैसे स्वार्थी लोग हैं वैसे ही परमार्थी लोग भी हैं । यदि ऐसा न होता तो यह संसार चल ही न पाता । इसलिए जैसे कुछ स्वास्थ्य संस्थाएं मरीजों को लूटती हैं, वैसे ही कुछ स्वास्थ्य मंदिर सेवा में लगे हैं । गुजरात तो विशेष रूप से सेवा संस्थाओं से परिपूर्ण है । उनमें से हम बीस स्वास्थ्य मंदिरों की सूची देकर दो संस्थाओं पर विशेष चर्चा करेंगे । यह सूची किसी क्रम में नहीं है, मात्र नामों की सूची है । संभव है कि गुजरात में ऐसी सौ से अधिक संस्थाएं हों । तो पाठकों से निवेदन है कि वे ऐसी संस्थाओं की जानकारी साझा करें । इतना ही नहीं, जब किसी गरीब मरीज को स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता हो तो इन बीस संस्थाओं में से किसी एक में उन्हें पहुंचाएँ । यहाँ केवल नामों की सूची दी गई है । पूरे गुजरात में ऐसी सैंकड़ों अस्पतालें होंगी । पाठकों से निवेदन है कि अन्य स्वास्थ्य सेवा मंदिरों के नाम बताएं ।
मैं शुरुआत करूँगा सूरत जनरल अस्पताल से । सूरत के महाजन द्वारा संचालित यह अस्पताल अपने मुख्य डॉक्टर भट्ट के नाम से ही जाना जाता है । डॉक्टर भट्ट सेवा का जीवंत उदाहरण थे । आज वर्षों बाद भी यह अस्पताल “डॉ. भट्ट की अस्पताल” के नाम से ही पहचाना जाता है । सूरत की बात आई है तो बच्चों के एक अस्पताल – यू. एन. एम. अस्पताल का नाम भी देना चाहिए । पूरे दक्षिण गुजरात से माता-पिता बच्चों की बीमारियों के इलाज के लिए इस अस्पताल की नि:शुल्क सेवा का लाभ उठाते हैं । मेरे ध्यान में आता है डॉ. शिवानंद अध्वर्यु नेत्र अस्पताल, वीरनगर । पूरे गुजरात में मुफ्त नेत्र ऑपरेशन विशेषकर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए प्रसिद्ध यह अस्पताल भावनगर-राजकोट मुख्य मार्ग पर वीरनगर स्थित है । डॉ. अध्वर्यु के निधन के बाद भी यह मुफ्त नेत्र चिकित्सा का कार्य जारी है । यह अस्पताल पूरे सौराष्ट्र में नेत्र चिकित्सा शिविर भी लगाता है और ज़रूरतमंदों को वीरनगर लाकर नि:शुल्क ऑपरेशन करता है । राजकोट व्यापार के साथ-साथ सेवाभावी स्वास्थ्य मंदिरों के लिए भी जाना जाता है । कई वर्षों से रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित अस्पताल यहाँ कार्यरत है । इस अस्पताल में साधु डॉक्टर सेवा करते हैं । राजकोट में ऐसी ही दो अन्य संस्थाएं हैं – एक कैंसर अस्पताल, जो नि:शुल्क कैंसर इलाज करती है, और दूसरी सत्य साई हार्ट अस्पताल, जो नि:शुल्क हृदय रोग ऑपरेशन करती है। हमारी शोध संस्थाओं और प्रबंधन संस्थाओं को ऐसी सेवाओं पर शोध कर पुस्तकें लिखनी चाहिए ।
कैंसर उपचार की बात करें तो उसके अंतिम चरण में मरीज को रखकर इलाज करना अत्यंत कठिन कार्य होता है । मृत्यु समीप होते मरीजों को अस्पताल के डॉक्टर घर ले जाने की सलाह देते हैं । परंतु अहमदाबाद की ठाकोरसी ट्रस्ट द्वारा संचालित जे. एस. अस्पताल ऐसे अंतिम चरण के मरीजों को रखती है और यह सेवा भी नि:शुल्क होती है ।
अब भावनगर जिले की ओर लौटें तो मुझे अत्यंत गौरव और आदर से टिंबी की निर्दोषानंद अस्पताल का नाम लेना होगा । आज भी राजपरा परिवार इसका संचालन करता है । इस अस्पताल में केवल इलाज ही नि:शुल्क नहीं होता, मरीज और उसके एक परिजन के रहने और भोजन की व्यवस्था भी नि:शुल्क होती है । मुझे लगता है कि वार्षिक खर्च लगभग 12 से 15 करोड़ तक आता होगा । ढोला से उमराला जाते मार्ग पर यह अस्पताल स्थित है । यह अस्पताल स्वामी निर्दोषानंद की नि:शुल्क इलाज की भावना से कुछ अनुयायियों द्वारा दान के प्रवाह से शुरू हुई । ऐसी ही एक अस्पताल धंधुका में स्थित आर. एम. एस. अस्पताल है । यहाँ भी मरीजों के इलाज के साथ-साथ भोजन और रहने की नि:शुल्क व्यवस्था है । प्रसव के लिए आई गरीब बहनों को ढाई किलो का कंबल भी दिया जाता है । यहाँ गाँव से आए लोग राहत पाते हैं ।
भावनगर की चर्चा हो रही है तो चलें महुवा की ओर । यहाँ डॉ. कनुभाई कलसरिया की सद्भावना अस्पताल स्थित है । वे अपने पास के कलसर गांव में भी एक अस्पताल चलाते हैं । बहुत ही साधारण कपड़ों में सज्ज और देशी भाषा बोलने वाले कनुभाई को हम एक निष्ठावान राजनेता के रूप में तो जानते ही हैं, परंतु वे एक विशेषज्ञ सर्जन भी हैं । मामूली शुल्क में इस अस्पताल में सभी रोगों का इलाज किया जाता है ।
मैं वर्षों पहले कनुभाई से मिलने गया था तो उन्होंने मुझे भी मामूली शुल्क लेकर अस्पताल की कैंटीन में भोजन कराया था । अब उत्तर गुजरात की ओर चलें तो हिम्मतनगर से आगे राजेन्द्रनगर में सुरेश सोनी (अब पद्मश्री) का आश्रम – सहयोग कुष्ठ रोग ट्रस्ट स्थित है । मैं इसे अस्पताल के बजाय आश्रम इसलिए कहूँगा क्योंकि इस संस्था में जिनको कोई नहीं रखता – ऐसे कुष्ठ रोगी और मानसिक रोगियों को रखकर इलाज किया जाता है । सामान्यतः जिन्हें कुष्ठ रोग होता है वे गरीब होते हैं या फिर गरीब बन जाते हैं । उनका परिवार उनका साथ नहीं देता । सुरेश सोनी की संस्था ऐसे लोगों का परिवार है । आदिवासी क्षेत्र में लोग बीमार न पड़ें और यदि पड़ें तो इलाज मिल सके – इसके लिए डॉ. अनिल पटेल राजपीपला के पास अड्डा जमाए वर्षों से बैठे हैं । मैं उन्हें ऋषि कहूं तो गलत न होगा ।
अब दो संस्थाओं – स्वास्थ्य मंदिरों – की विशेष चर्चा करते हैं । एक है सेवा रूरल, झगड़िया और दूसरी एचसीएफ अस्पताल, अहमदाबाद । सेवा रूरल झगड़िया में न केवल अस्पताल चलाती है बल्कि कई अन्य गतिविधियां भी करती है । अमेरिका में बहुत बड़ी चिकित्सीय प्रैक्टिस चलाने वाले डॉ. अनिल देसाई को विवेकानंद की प्रेरणा से मन में भाव आया कि भारत के गांव में जाकर गरीब और आदिवासी लोगों के लिए कार्य करना चाहिए । उनका सेवा मंत्र था – “जीवन अंजलि बनो” ।
पति-पत्नी डॉ. अनिलभाई और डॉ. लताबेन भारत लौटे और एक ट्रस्ट की स्थापना की जिसका मिशन था – सबसे गरीब लोगों की सेवा करना । उनका ट्रस्ट सरकार से मान्यता प्राप्त कस्तूरबा अस्पताल तो चलाता ही है, साथ ही शिक्षा, कौशल विकास, गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम भी चलाता है । 250 बिस्तरों वाले अस्पताल में सभी मरीजों का इलाज और ज़रूरी ऑपरेशन नि:शुल्क होते हैं । 1987 से अब तक 30 लाख लोगों ने इस अस्पताल की सेवा ली है । पिछले एक वर्ष में 1,50,000 ओपीडी और 24,000 भर्ती मरीज दर्ज हुए हैं । प्रति वर्ष लगभग 6000 ऑपरेशन होते हैं । अब अनिलभाई तो नहीं रहे, और लताबेन बीमार हैं । लेकिन मेरे पुराने सहयोगी डॉ. पंकजभाई शाह उतनी ही निष्ठा और सेवा भावना से अस्पताल चला रहे हैं । हर वर्ष अमेरिका से दान की धारा यहां बहती रहती है ।
अहमदाबाद की एचसीएफ (हेल्थ एंड केयर फाउंडेशन) अस्पताल, जो जुहापुरा, गुप्तानगर, जीवराजपार्क, राजीवनगर जैसे पिछड़े क्षेत्रों के बीच स्थित है – यह संस्था डॉ. भरत भगत और उनके कुछ साथियों की प्रतिबद्धता की कहानी है । 1990 के आसपास लायंस क्लब से जुड़े कुछ डॉक्टरों ने पोलियो उन्मूलन शिविर किया । वहाँ से यह विचार आया कि 40% पोलियो के मामले ऑपरेशन से ठीक हो सकते हैं । इससे प्रेरित होकर इन डॉक्टरों ने मिलकर पोलियो फाउंडेशन बनाया । पोलियो के मामले खोजकर ऑपरेशन करने की मुहिम शुरू की । बाद में पूरे भारत में घर-घर पोलियो की खुराक पिलाई गई जिससे 2006 में भारत से पोलियो का उन्मूलन हो गया । उस समय इस डॉक्टर ने बच्चों की एक और बीमारी — सेरेब्रल पाल्सी का एक मामला खोज निकाला और उसका इलाज शुरू किया । अब यह कार्य प्रसिद्ध होता गया और दान की धारा बहने लगी । इससे उन्होंने पहले पोलियो फाउंडेशन नाम से इन्दुकाका इफ्कोवाला सेवा संस्थान की स्थापना की । लेकिन जैसे-जैसे मरीजों की संख्या बढ़ती गई उन्हें बहुरोगीय अस्पताल की आवश्यकता महसूस हुई । 2010 में जीवराजपार्क के राजवाड़ू होटल के सामने AUDA ने उन्हें भूमि प्रदान की और धीरे-धीरे यह भव्य अस्पताल आकार में आया । आज इस विशाल भवन में 60 रोगों की ओपीडी चलती है ।
मैं एक उदाहरण देकर बात स्पष्ट करूँगा । आजकल शारीरिक जांच की प्रथा बढ़ी है । अच्छे अस्पतालों में फुल बॉडी चेकअप की कीमत 5000 रुपए होती है । एचसीएफ अस्पताल में यह जांच केवल 600 रुपए में होती है । मैंने डॉ. भरत भगत से पूछा कि ये 600 रुपए में कैसे संभव होता है ? उन्होंने बताया, “वास्तव में हमें यह जांच 3000 रुपए में पड़ती है । लेकिन हम डोनर से मांग कर इसका खर्च निकालते हैं ।”
यह बात यहीं खत्म नहीं होती । इस क्षेत्र में ऐसे गरीब मरीज होते हैं जो 600 रुपए भी नहीं दे सकते । डॉ. भगत बताते हैं कि लगभग 70% मरीजों को हम नि:शुल्क सेवा देते हैं । इसके अलावा ब्रांडेड दवाओं की जगह यहाँ जेनरिक दवाओं का स्टोर है जिससे दवा भी 50% सस्ती मिलती है ।
सवाल यह उठता है मित्रों, कि मेरे पास चिकित्सा विद्या है जिससे मैं धन कमा सकता हूँ । लेकिन इसके बजाय मुझे ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने का मन क्यों होता है ? इसका अर्थ है कि यह संसार अभी पतन के गर्त में नहीं गया है । यदि आपको भी ऐसे स्वास्थ्य मंदिर की जानकारी हो तो ज़रूरतमंदों को बताएं । हाँ, मानवता में श्रद्धा रखना आवश्यक है और मानवता को पहचानना भी ।
सौजन्य : विद्युत जोशी
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