ॐ और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन ! 

ॐ और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन ! 

ॐ और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन ! 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

इसका अर्थ है :

ॐ अर्थात परमात्मा पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है । उस पूर्ण से यह पूर्ण आत्मा उत्पन्न होती है । पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी जो बचता है वह भी पूर्ण ही रहता है ।

ॐ रूपी आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक मनुष्य-शरीर की रचना

मनुष्य शरीर की सबसे पहली एकल कोशिका शून्य (पूर्ण) रूपी ॐ के शीर्ष भाग जैसी होती है , जिससे मनुष्य की प्रारंभिक उत्पत्ति ॐ रूपी परमात्मा के शीर्ष भाग से होती है । मनुष्य शरीर की एक कोशिका से धीरे-धीरे कोशिकाएँ बढ़ती जाती हैं । 6 से 7 दिन में 60 से अधिक कोशिकाएं मिलकर एक कली (Bud) जैसी आकृति बनाती हैं, जिसे ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) कहते हैं । गर्भाशय में इसके स्थापित (implant) होने के बाद लगभग 36वें दिन के आसपास गर्भनाल (Placenta) बनती है । इससे नाल (Umbilical Cord) बनती है, जिससे भ्रूण को माता से पोषण प्राप्त होता है । इस प्रकार भ्रूण का विकास बहुत तेजी से होता रहता है । 25 दिन का भ्रूण मेंढक के आकार जैसा दिखाई देता है, जो 56वें दिन मनुष्य शरीर में परिवर्तित हो जाता है । चित्र में इस चंद्राकार आकृति के नीचे सफेद गोलाकार प्रकाशपुंज दिखाया गया है । यह प्रकाशपुंज आत्मारूपी प्रकाश अर्थात आत्मा है । यही आत्मा शरीर को संचालित करने वाली परमात्मा की परमशक्ति है । 40 से 50 दिन के बीच आत्मारूपी जीव मनुष्य-शरीर में प्रवेश करता है, जिसे मेडिकल भाषा में हृदय की धड़कन शुरू होना (Heart Beat) कहा जाता है ।

60 दिन के आसपास विकास के दौरान मनुष्य शरीर तीन भागों में दिखाई देता है । (ॐ के चिह्न में) चित्र में सफेद गोलाकार प्रकाशपुंज से चंद्राकार को ऊर्जा (शक्ति) प्राप्त होती है जिससे वह ‘3’ आकार जैसा बनता है । इस ‘3’ के ऊपरी भाग को मस्तिष्क (Head) कहा जाता है जो ज्ञान का केंद्र है । बीच वाला भाग हृदय (Heart) होता है , जिससे भक्ति उत्पन्न होती है । निचला भाग हाथ-पाँव आदि (Hand) होते हैं, जिनसे कर्म किया जाता है । इस प्रकार यह ‘ॐ’ का ‘3’ दिखता है । संक्षेप में कहें तो – मस्तिष्क, हृदय और हाथ यानी ज्ञान, भक्ति और कर्म के द्वारा सब कुछ पाया जा सकता है ।

सफेद गोलाकार प्रकाशपुंज के ऊपर पीले रंग का गोल हिस्सा दिखाया गया है । इसे Yolk Sac (भ्रूण के लिए अस्थायी पोषण पदार्थ) कहा जाता है , जो भोजन के रूप में बच्चे के विकास में सहायता करता है ।

चित्र में पीले गोलाकार के ऊपर Placenta को मिश्रित रंग (पीला + लाल + भूरा आदि) में दिखाया गया है । बड़ा गोलाकार गर्भाशय के रूप में दिखाया गया है । यह भ्रूण की सुरक्षा करता है । इसी से Umbilical Cord (नाल) बनती है , जिसका सिरा बच्चे के पेट में जुड़ा हुआ दिखाया गया है । (ॐ जैसा ही यह दिखता है ।) इसके माध्यम से बच्चे को आवश्यक पोषण प्राप्त होता है । अंततः 270 दिनों के आसपास पूर्ण मनुष्य शिशु तैयार हो जाता है । बच्चे के जन्म के समय उसके पीठ पर हल्का आघात किया जाता है । शिशु तुरंत मुँह से “अ … उ … म् …” अर्थात ॐ का उच्चारण करता है । साँस लेना शुरू करता है । लौकिक भाषा में यह रोना कहलाता है । मेडिकल भाषा में इसे श्वसन (Breathing) शुरू होना कहते हैं । इस श्वसन के स्वर को आध्यात्मिक भाषा में सोऽहम् कहा गया है, जिसका अर्थ होता है – परमात्मा और मैं एक ही हैं ।

मृत्यु का अर्थ है – मनुष्य-शरीर के दीपक का बुझ जाना । इस समय घर का वातावरण अंधकारमय हो जाता है इसलिए चित्र के चारों कोनों व किनारों पर अंधेरा दिखाया गया है । इस प्रकार घर का वातावरण कुछ समय के लिए अंधकारमय बना रहता है । मृत्यु के नीचे वसीयत (भस्म) के रंग में है । मनुष्य की मृत्यु के पश्चात जो शेष रह जाता है वह है उसकी वसीयत – यानी एकत्र की गई संपत्ति है ।

चित्र के पीछे ॐ रूपी मनुष्य का जीवनचक्र दर्शाया गया है , जिसमें जन्म से लेकर बाल्यावस्था-किशोरावस्था को दिखाया गया है । फिर युवावस्था में कठिन परिश्रम करते-करते मनुष्य वृद्धावस्था में पहुँचता है । वृद्धावस्था में लाठी या व्हीलचेयर के सहारे जीता है और अंत में मृत्युशैय्या पर पहुँच जाता है – यह भी चित्र में दर्शाया गया है ।

– विजय गांधी

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