भगवान को वश करनेवाला वशीकरण है सत्संग !
भगवान को वश करनेवाला वशीकरण है सत्संग !
भगवान की माया भलभलों को, अच्छे-अच्छों को फँसा देती है । लेकिन ऐसा नहीं है कि उससे पार होना कठिन हो, मुश्किल हो । जो भगवान की शरण आते हैं, बड़ी सहज में, बड़ी आसानी से इस महामाया को तर जाते हैं । जैसे एक मछुआरा मछलीओं को पकड़ने के लिए जाल फेंकता है, लेकिन एक मछली ऐसी थी जो उस मछुआरे के चरणों के आसपास घूमती रही । मछुआरे ने लाख कोशिश की लेकिन वह उसके जाल में फँस न सकी । क्योंकि वह उसीके कदमों में लोटपोट हो रही थी । ठीक उसी प्रकार भगवान की माया उसीको फँसा सकती है, जो भगवान के चरणों से दूर होता है, तो भगवान के चरणों की छत्रछाया में रहता है उसके ऊपर माया का कोई प्रभाव नहीं चल सकता । वह माया से पार हो जाता है, माया से तर जाता है । सत्संग ही भगवान के चरण हैं । सत्संग ही वो एक वशीकरण है जो भगवान को भी वश कर देता है । औरों की तो क्या बात है ? भगवान स्वयं कहते हैं –
नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न वै |
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ||
कभी मैं वैकुंठ में नहीं रहता, कभी योगियों के हृदय को उल्लंघन कर जाता हूँ । लेकिन जहाँ मेरे भक्त प्रेम से, प्रीतिपूर्वक मेरा गान करते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, मेरा ध्यान करते हैं, मेरे में मन लगाते हैं, आवृत्ति करते हैं, पुनरावृत्ति करते हैं, स्मरण करते हैं, अनुस्मरण करते हैं, पुनः स्मरण करते हैं, माया से बड़ी सरलता से तर जाते हैं ।
संध्या का समय है । मैं चाहता हूँ कि जिस प्रकार अर्जुन ने भगवान में मन लगा दिया था, मीराबाई ने, शबरी भीलण ने, ध्रुव ने, तुकाराम ने, प्रह्लाद ने, ज्ञानदेव ने, ज्ञानेश्वर ने, समर्थ रामदास ने लगा दिया था और कई नामी-अनामी, जाने-अनजाने कई संतों ने, महापुरुषों ने, भक्तों ने जिस प्रकार अपने मन को भगवान में लगा दिया था और संसार से आसानी से तर गए थे । ठीक उसी प्रकार आप भी अपने मन को भगवान के उस स्वरूप में लगाओ । चाहे राम में, चाहे कृष्ण में, चाहे विठ्ठल में, पांडुरंग में, चाहे किसी संत में, चाहे किसी भक्त में । क्योंकि भक्त में और भगवान में कोई फर्क नहीं है । संत में और भगवान में कोई फर्क नहीं है । वह एक ही तो हैं, लेकिन लगाओ जरूर । न लगे तो फिर से अपने बिखरते हुए मन को, भटकते हुए मन को, भागते हुए मन को फिर-फिर से पकड़ो । छटक जाए तो फिर पकड़ो । फिर-फिर से लगाओ । अपने मन को समझाओ – ‘हे मेरे मन, कहाँ तक तू भागेगा ? कहाँ तक तू दौड़ेगा ? कहाँ-कहाँ दौड़ेगा ? आज तक तो तू भागा । क्या मिला ? अभी भागेगा क्या मिलेगा ? कुछ नहीं मिलनेवाला है |’
खुब शांति, खुब शांति, खुब शांति,
परमेश्वरीय शांति, मनमोहक शांति,
अहलाद्क शांति, परम शांति, मधुर शांति,
मंगलमय शांति । शांत होते जाओ ।
ॐ… ॐ… ॐ…
भगवान कहते है – ‘मैं सुलभ हूँ |’
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।।
उस योगी के लिए मैं सुलभ हूँ ।
‘‘अनन्यचेताः सततं |’’
कि वह अनन्य चित्त से मेरा स्मरण करता है । काम करते रहो, नाम जपते रहो । मन की भागादौड़ी को मिटाते रहो ।
परमात्मा स्मरण करने योग्य हैं,
परमात्मा ध्यान करने योग्य हैं,
परमात्मा चिंतन करने योग्य हैं,
परमात्मा में ही मन लगाने योग्य है बाकी और किसी में मन लगाया तो सिवा दुःख के, पीड़ा के, चिंता के, भय के क्या मिलेगा ?
पैसे कमाने में भी पीड़ा है, महेनत है, रखने में भी चिंता है, कोई छीनकर न ले जाए । बैंक में रखा तो बैंक डूब जाएगी । चिंता लगी हुई है, भय लगा हुआ है । कहीं किसीको दिया तो क्या पता वापस आएगा, नहीं आएगा ? जमीन में लगाया तो क्या पता घाटा ना हो जाए । भय और चिंता लगी रहती है । खर्च करने में फिर महेनत है । पत्नी में मन लगाया तो पत्नी एक जैसी सदा नहीं रहेगी, पति में मन लगाया तो पति का व्यवहार एक जैसा सदा नहीं रहता है । बच्चों में मन लगाया बच्चा कहना नहीं मानते तो पीड़ा ।
दुनिया की एक भी वस्तु ऐसी नहीं है कि जो परमानेंट आनंद देनेवाली हो । सुख का आखरी सोल्यूशन परमात्मा है, भगवान है, भगवान का ध्यान है, भगवान का नाम है । बस मन लगाते जाओ ।
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