ब्रह्मलीन मातुश्री माँ महँगीबाजी “अम्मा” का महानिर्वाण दिवस !
ब्रह्मलीन मातुश्री माँ महँगीबाजी “अम्मा” का महानिर्वाण दिवस !
मेरी दादी माँ का मेरे ऊपर बहुत अपार स्नेह था और जिस ढंग से दादी माँ ने ‘अम्मा’ ने पूज्य बापूजी को बड़ा किया उससे मुझे लगता है कि उन्होंने दुगने प्यार और स्नेह से मेरे को बडा किया ।
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“सींच दिया है उर आँगन में, शील धर्म का अँकुर है।
गुरु ही राम रहीम ईश हैं, ब्रह्मा विष्णु शंकर हैं।।“
पूजनीया अम्मा अर्थात् पूर्ण निरभिमानिता का मूर्त स्वरूप ! लोग जब अम्मा के दर्शन करने जाते, तब संसार-ताप से तप्त हृदय सहज ही उनके समक्ष खुल जातेः “अम्मा ! आप आशीर्वाद दो न ! मैं मुसीबत से छूट जाँऊ….”
अम्मा का गुरुभक्त हृदय सामने वाले की गुरुनिष्ठा को मजबूत कर उसके हृदय में उत्साह एवं उमंग का संचार कर देता। वे कहतीं- “गुरुदेव बैठे हैं न ! हमेशा उन्हीं से प्रार्थना करो कि ʹहे गुरुवर ! हम आपके साथ का यह संबंध सदा निभा सकें ऐसी कृपा करना… हम गुरु से निभाकर ही इस संसार से जायें….ʹ माँगना हो तो गुरुदेव की भक्ति ही माँगना। मैं भी उनसे यही माँगती हूँ। अतः तुम्हें मेरा आशीर्वाद नहीं अपितु गुरुदेव का अनुग्रह माँगते रहना चाहिए। वे ही हमें हिम्मत देंगे, बल देंगे। वे शक्तिदाता हैं न !
साधना-पथ पर चलने वाले गुरुभक्तों को अम्मा का यह उपदेश अपने हृदयपटल पर स्वर्णाक्षरों में अंकित कर लेने जैसा है।