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अनमोल संदेश (12 October 2016)

मेरे प्यारे साधकों, भाईयों, बहनों, मित्रों, साथियों, समर्थकों, पाठकों, देश-विदेश में रहनेवाले मेरे चाहकों ! आप सभी को नवरात्रि, दशहरा, विजयादशमी और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

डटे रहो, लगे रहो पारमार्थिक कार्यो में, भारत को विश्वगुरु बनाने में, आत्म उन्नति में और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में ! अन्याय, अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद हो, कोशिशें तेज हो और आपका हमारा हौंसला कमजोर न होने पाये बल्कि और बढ़ता जाए !

यह देश सिर्फ सीमा पार के ही आतंकवाद से पीड़ित नहीं है बल्कि देश के भीतर भी कई तरह के आतंकवाद हैं । वर्षो तक न्याय के इंतजार में जेलों में पीड़ित लोग व उनके परिवार न्यायिक आतंकवाद के शिकार हैं । इस देश को ज्युडीशियरी टेरेरिझम से भी मुक्त होने की जरुरत है । क्या इसके लिए हमें कुछ करना नहीं चाहिये ? लाखों-करोड़ों लोगों पर ये अन्याय देखकर आखिर कब तक यूँ ही चुप बैठे रहोगे ? आपको जागृति लानी चाहिये, आवाज उठानी चाहिये और इस समस्या को सुलझाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिये । पढ़ाई के बोझ तले कितने ही छात्र आत्महत्या करते हैं । कई लोग घरेलु आतंकवाद के शिकार हैं । धारा 498 का भी भारी दुरुपयोग हो रहा है । महिला सुरक्षा के लिए बनाये गये बलात्कार के कानूनों का भी दुरुपयोग करनेवाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है । आप इस देश में किसी को भी आसानी से जेल भेज सकते हैं और वो भी असीमित अवधि के लिए !

किसी भी देश के विकास का मापदंड कदापि ये नहीं हो सकता कि उस देश में जेलें कितनी है, आरोपी और अपराधी कितने हैं और न्यायालयों की संख्या, पुलिस थानों की संख्या, पुलिस कर्मचारियों की संख्या और केसों की संख्या कितनी अधिक है ! इस देश में बार-बार जजों की संख्या कम बताई जाती है । हकीकत में देश का विकास तो तब माना जायेगा जब जेल में आरोपी, अपराधी कम होते जायेंगे । अपराध कम होंगे । किसी भी देश में न्यायालयों, थानों, केसों, न्यायाधीशों का बढ़ते चले जाना ये विकास नहीं माना जा सकता यह तो देश को विनाश की ओर जाने का संकेत है । अपराधमुक्त समाज, अपराध मुक्त देश बनाना संभव है । घोर से घोर अपराधी को भी महात्मा-साधु-सज्जन बनाया जा सकता है । संपूर्ण मानसिक परिवर्तन किया जा सकता है इस बात पर विश्वास रखते हुए सरकारों को व आध्यात्मिक लोगों को अवश्य काम करना चाहिए ।

इस धरा पर मनुष्य रूप में अवतरित पुण्यात्मा जीवात्मा को सत्य, प्रेम, करुणा व मधुरतायुक्त आनंदमय ओजस्वी आध्यात्मिक जीवन की कामना स्वतः पैदा होती है लेकिन इस संसार के कोलाहल में माया मोह के प्रभाव से मनुष्य धीरे-धीरे अपनी महिमा को और दिव्य जीवन प्राप्त करने के लक्ष्य को भूलता चला जाता है तब उसे आवश्यकता होती है एक सच्चे मार्ग की, एक सच्चे सद्गुरु की, जो आत्मा की महानता जानने में, सत्यानुभूति करने में, आत्मसाक्षात्कार में उसकी सहायता कर सके । सद्गुरु के बिना इस महान लक्ष्य तक पहुँचना बहुत कठिन है लेकिन असंभव नहीं । इस धरा पर ऐसे सद्गुरु आज भी हैं जो आपको ओजस्वी आध्यात्मिक दिव्य जीवन प्रदान करने में समर्थ हैं और आपकी पूर्ण सहायता कर सकते हैं । आपको चाहिए कि आप उनके प्रति श्रद्धा व विश्वास बनाये रखें और पूर्ण निष्ठा से उनके बताये हुए मार्ग को पकड़े रहें । अपने मन को संदेहों से मुक्त रखें तो अवश्य वे दूर होने के बावजूद आपका मार्गदर्शन करेंगे । आपको प्रेरित करेंगे । आपके ऊपर उनकी कृपा की धारा बरसती रहेगी । आप भ्रमित हुए बिना, बहकावे में आए बिना, गुमराह हुए बिना अपनी श्रद्धा, विश्वास को मजबूत बनाए रखें और अपने लक्ष्य को न भूलें तो अवश्य आप सफल होंगे और दुर्लभ आत्मतत्व को प्राप्त करने में, ईश्वरानुभूति करके जीवन को सार्थक बना लेंगे ।

मेरा जन्म और जीवन सिद्ध सद्गुरु पू. लीलाशाहजी महाराज की कृपा का प्रसाद है । मेरे पिताश्री उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बने और विश्वविख्यात सिद्ध सद्गुरु बने । मेरे पिताश्री का जीवन लोगों के लिए वरदान बन गया । कुछ लोग जो सद्गुरु की कड़ी परीक्षाओं में फेल हो गए वे अपने लक्ष्य से भटक गये और माया में भ्रमित हो गये ! कुछ विरोधी बन गये तो कुछ दुश्मन भी बन गये । उनका भी अंत में तो कल्याण ही होगा क्योंकि वे भी किसी न किसी तरह सद्गुरु का चिंतन तो करते ही हैं । और जिन्होंने थोड़ा-सा भी सद्गुरु के निर्देशानुसार धर्माचरण किया है उसका अकल्याण तो हो ही नहीं सकता ! ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ कि थोड़ा-सा भी धर्म का आचरण महान भयों से मुक्त करता है । सो, देर-सबेर, गुमराह हुए भटके वे लोग भी सही रास्ता प्राप्त करें क्योंकि आध्यात्मिक जीवन की ऊँचाईयों को प्राप्त करना ही जीवन का साफल्य है । सद्गुरुओं को समझना बच्चों का खेल नहीं है । उनका हर व्यवहार बुद्धि की पकड़ में आए ये कोई जरुरी भी नहीं है ।

आध्यात्मिक संपदा को प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ दाव पर लगाना पड़ता है । जो दाव पर नहीं लगा सकते वे हार जाते हैं, फिसल जाते हैं और उनकी हालत ऐसी होती है कि ‘मियां गिरे पर टंगड़ी ऊँची ।’ या फिर ‘नाच न जाने तो आँगन टेढ़ा ।’ या ‘अंगूर खट्टे हैं ।’ सद्गुरुओं ने अपने शिष्यकाल में जिस आध्यात्मिक सम्पदा को कड़ी मेहनत व भरपूर लगातार प्रयासों से कृपा प्राप्त करने के लिए जिस तरह से स्वयं को ढाला व क्या-क्या बलिदान किया इस विषय पर विस्तार से बताया जाए या लिखा जाए तो बहुत बड़ा ग्रंथ तैयार होगा । अन्तर का रूपांतरण कर पाना मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार है । जो भीतर ही है उसे खोज पाना, खोल पाना रहस्यों के आवरण में छिपा हुआ सत्य है जिसे सद्गुरु खोलने के लिए शिष्य को गढ़ते हैं । ये मिट्टी को घड़ा बनाने जैसा है या बीज को वृक्ष बनाने जैसा है । कई बीज वृक्ष में तैयार हो पाते है, कुछ नहीं भी । बीज तो विरोध किए बिना नष्ट हो जाता है पर मानव रूपी बीज सद्गुरु का ही विरोधी हो सकता है । और इसीलिए सद्गुरु का काम बहुत कठिन है, जटिल है । अपने समय के सिद्ध सद्गुरुओं में मेरे पिताश्री का कार्य बहुत ऊँचा था । और विश्व के इतिहास में अब तक हुए सद्गुरुओं ने अपने जीवनकाल में जितना काम किया उससे कहीं अधिक आध्यात्मिक आलोक का कार्य मेरे पिताश्री ने किया इस बात को तो विरोधी भी मानते हैं । साधक तो मानते ही हैं विश्व के वे लोग भी मानते हैं जो कभी हमारे आश्रमों में नहीं आए ! हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मो को माननेवाले लोग भी हैं लाखों-करोड़ों की संख्या में जो मेरे पिताश्री के ज्ञान को पुस्तकों में पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं ।

मित्रों, उस समय को मैं देख रहा हूँ कि जब पूरा विश्व मेरे पिताश्री की महानता को समझेगा । अंधकार के बाद प्रकाश तो होता ही है । ये अँधेरा बहुत काल तक रहने वाला नहीं है । दुनिया को आध्यात्मिक प्रकाश की जरूरत है । हमें सबसे पहले अपने भीतर श्रद्धा, प्रेम, विश्वास और ज्ञान की रोशनी से स्वयं को जगमगाएं और हमारे ज्ञान से दुनिया में सत्य, प्रेम, करुणा का प्रकाश फैले । सद्गुरु की कृपा हम सबको अपना माध्यम बनाने की प्रतिक्षा कर रही है । आइये, हम खुद को काबिल बनाएं ! कृपा को सार्थक बनाएँ ! स्वयं को माध्यम बनाएँ ! भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए !

आपको – अंतरमन से शुभकामनाएं !

– नारायण साँई ‘ओहम्मो’

12/10/16 प्रातः 7:20

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