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नारायण साँई की पाती : दिल की बात…

आज 28 नवम्बर, 2018, बुधवार, सूरत जेल ।

मैं, नारायण साँई, पुनश्च – आपको इस पत्र के जरिये अपने दिल की बात बतलाने के लिए आपके स्नेह-भाव, आत्मीयता से बंधा हुआ, सूरत जेल के बंधनों के बीच से, प्रेरित-उत्सुक हो रहा हूँ !
सूरत की जेल पर, आज शाम को चंद मिनटों की मेरी मुलाकात में मैं गिन ही नहीं पाया, न जाने कहाँ-कहाँ से कितने ही लोग उमड़ पड़े… सूरत आश्रम के मेरे पुराने गुरुभाई श्री रूपाभाई, भद्रेशभाई, वापी के श्री रावलजी, सूरत के हिम्मतजी, उमादेवी, मृदुल भैया, निलेशजी, रतलाम से आशाजी, हरियाणा-पंजाब से भी तो मुम्बई से भावेश भाई सपरिवार… तथा कुछ आश्रमवासी भाई-बहन… कितने नाम याद रखूँ व लिखूँ… समझ ही नहीं आ रहा… परन्तु वे न जाने कितनी दूर से मेरी झलक व दो शब्द बात करने आ जाते हैं चूँकि सभी से बात करना नामुमकिन है, फिर भी आते हैं – न जाने 15-20-25 मिनट की मुलाकात में क्या मिलता है – मेरी समझ से बाहर है फिर भी, आपके मन में मेरे लिए इतना स्नेह-प्रेम और आदर है कि आप मेरी कुशलता-मंगलमयता व स्वस्थता को जब तक अपनी आँखों से देख नहीं लेते, शायद आपको चैन नहीं पड़ता, और इसलिए मुझे देखने, मेरी कुशल-मंगल पूछने आप दूर-दूर से कई घंटों-घंटों की सफर करके, असुविधा-दिक्कतें सहन करके, घंटों प्रतिक्षा करके भी मेरी मुलाकात कर पाने में सफल हो ही जाते हो ! आपकी श्रद्धा, आपकी भक्ति, आपका प्रेम, आपका विश्वास कितना गहरा है और मजबूत है इसे बतलाने के लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं है । आपके पवित्र दैवी विश्वास को मेरे ऊपर संगीन व अत्यंत गंभीर दुष्कर्म-रेप के आरोप लगने के बावजूद भी जिस ईश्वर ने टिकाए रखा है और अपार बदनामी मेरी होने के बावजूद भी, जेल में करीब पाँच वर्ष होने के बाद भी आपके मन में मेरे लिए जो श्रद्धा, प्रेम, विश्वास बरकरार रह पाया है उसका कारण भी ईश्वर हैं । उस ईश्वर को मैं बार-बार धन्यवाद देता हूँ और शुक्रिया अदा करता हूँ ।
आप सभी कैसे हैं ? ठीक हैं ? कुशल हैं ? स्वस्थ हैं ? चूँकि दर्शन-सत्संग बिन पूर्ण कुशलता कहाँ ? फिर भी आपको मन मायूस किए बिना हौंसला बुलंद करके जीना होगा ! प्रतिक्षा करना होगा ! आशा ही जीवन है । आशा बनाए रखनी होगी तभी तो राम भी मिलेंगे !! मैं विचार करता हूँ कई आश्रमवासी साधक-साधिकाएँ अदालत का फैसला आने के पश्चात् निराशा-हताशा के गर्त में डूबे होंगे क्योंकि यह स्वाभाविक है । फिर भी, उपदेश-स्वाध्याय-सत्संग व आध्यात्मिकता के बल पर विपदा व नकारात्मक स्थिति में स्वयं को संभाले रखने की ऊर्जा बरकरार रखनी होगी । सद्गुरु की प्रचंड शक्ति समय पर अपना स्वरूप दिखायेगी । उस समय की प्रतिक्षा करते हुए अपनी राह पर शेर की नाईं चलते रहने की आपसे मैं उम्मीद करता हूँ ! गुरुदेव ने मंत्र दिया था – ‘न दैन्यं न, पलायनं ।’ कि ना तो दीनता स्वीकार करो, न पलायनवाद अंगीकार करो ! चलते रहो हिम्मत से, आगे बढ़ो बल से । पलायन मत करो ! ये खास बात है । पलायनवादी, डरपोक, दीन-हीन-दुर्बल के लिए आत्मोपलब्धि कठिन है, असंभव है । उपनिषद् के ऋषि ने कहा है – सत्य की राह, सत्य की आवाज, सत्य के प्रयोग, सत्य की उद्घोषणा और सत्य के आचरण से हमें कोई कदापि रोक नहीं सकता ! चाहे कुछ हो जाए ! चाहे मेरा शरीर स्वतंत्र हो या बंधन में रहे, हमारी यह संकल्पना अडिग है । दृढ़ता बरकरार है । स्वतंत्रता के आवाज को गोलियों से दबाया नहीं जा सकता, अगर दबाया जा सकता तो हमारा देश आज भी गुलाम ही होता ! बोलो, क्या ख्याल है ?
क्या आपने मलाला का नाम सुना है ? जिसने शिक्षा के लिए बिना डरे, बिना थके प्रयास जारी रखा, चहुँ ओर भय व अशांति की आँधी के बीच – और सफलता प्राप्त की, आज के युग में अच्छा काम करने के लिए हमारे सामने आनेवाली भयंकर बाधाओं, दिक्कतों के बीच भी सफल होकर दिखाना, ये मलाला के जीवन से हमें प्रेरणा लेने जैसा है ।
सत्य और ब्रह्मचर्य के प्रयोग करनेवाले महात्मा गांधी ने ये प्रयोग करते-करते जिंदगी दाव पर लगा दी, बिना हिचकिचाहट के । ये ताकत, ये ऊर्जा हमारे भीतर भी हमें विकसित करनी होगी । सरदार पटेल ने देश को एक करने के लिए अपने जीवन को लगा दिया, अपने नौकरी-पेशे-व्यापार को तिलांजलि दे दी । भेदभाव-रंगभेद को खत्म करने के लिए आफ्रिका में नेल्सन मंडेला वर्षों तक जेल में रहे । बाद में राष्ट्रपति बने । इतिहास में ढेरों उदाहरण मिल जायेंगे ऐसे कि विपरीत माहौल और परिस्थितियों के बीच वे कितनी मज़बूताई से हौंसला बुलंद करके रहे ! जिंदगी का नाम है जिंदादिली । जिंदादिली से असंभव, कठिन और मुसीबतों के महासागर के बीच रास्ता निकालनेवाले हिम्मत से युक्त मनोबल-प्राणबल के धनी इंसानों की गाथाओं से इतिहास के कईयों पन्ने भरे हैं । आज भी उद्यमी, पुरुषार्थी लोग हैं – श्रीकांत बोला जो कि प्रज्ञाचक्षु हैं, उनकी सत्य कहानी विश्वगुरु ओजस्वी पत्रिका में छपी थी, आपने पढ़ी होगी ।
आज सूरत के सितारवादक पं. महादेव शर्मा शास्त्री के पुत्र शारदाकुमार शास्त्री का देवलोकगमन हुआ है । वे सुप्रसिद्ध सितारवादक, वायोलीनवादक और आकाशवाणी के मान्य कलाकार थे । वे 75, विवेकानंद टाउनशिप, पालनपोर पाटिया, सूरत में निवास करते थे । मैं उनके निधन पर श्रद्धांजलि देता हूँ और ईश्वर से उनकी आत्मा को शांति मिले इसके लिए प्रार्थना करता हूँ ।
हाल ही में मोहम्मद अजीज*का भी अवसान हुआ है जो मो. रफी के चाहक थे और अच्छे गायक कलाकार थे । दक्षिण गुजरात में 30 से अधिक उनके कार्यक्रम हुए थे । संगीत की दुनिया की ये दो हस्तियाँ दुनिया को अलविदा कह गई !
26 व 27 नवम्बर को सूरत के विद्वान वकील श्री किरीट भाई सी. पानवाला ने सूरत न्यायालय में जो मेरे केस के बारे में सचोट, सच्चाई से युक्त बहस की, पूरी कोर्ट का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर गया और मुझ पर लगे झूठे आरोपों की पोल खुल गई । ‘साँच को आँच नहीं, झूठ को पाँव नहीं’ उक्ति चरितार्थ होने लगी । एक-एक करके बड़ी ही सूक्ष्मता से प्रमाणों के साथ उन्होंने मुझ पर लगे आरोपों का खंडन किया जिससे सभी संतुष्ट और प्रसन्न नजर आए । उम्मीद है बहुत जल्दी उनकी, श्री बी.एम.गुप्ताजी की, विनय शुक्लाजी एवं अधिवक्ता श्री कल्पेशभाई देसाई द्वारा कि माननीय न्यायालय को जो खुलासे तथ्य दिये गए उससे कोर्ट सहमत होती गई । जिससे सकारात्मक परिणाम आने की संभावनाएं मैं देख रहा हूँ । आशा है – आनेवाले दिनों में मैं आपके बीच हो सकता हूँ ! ऐसी उम्मीद करते हैं ।
अमेनेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ विश्वभर में फाँसी की सजा को निरस्त करने के लिए सभी देशों की सरकारों को समझाने के प्रयास कर रही हैं । मैं भी कुछ वर्षों से चाहता हूँ कि भारत में फाँसी की सजा को रद्द करने का प्रावधान करने की आवश्यकता है और भारत के सुप्रीमकोर्ट के जज कुरियन ने भी इसी विचारधारा का समर्थन किया है कि “मृत्युदंड, समाज में अपराध को खत्म करने में विफल रहा है ।” छत्तीसगढ़ में ट्रिपल मर्डर के साथ जुड़े छन्नूलाल वर्मा को कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई थी जिसे निरस्त करने के लिए छन्नूलाल ने सुप्रीमकोर्ट में अरजी की थी कि – ब्रिटेन, अनेक लेटिन अमेरिकन और ऑस्ट्रेलिया के देशों में फाँसी की सजा को निरस्त किया गया है तो भारत में भी इस सजा को निरस्त किया जावे । चूँकि सुप्रीमकोर्ट ने फाँसी की सजा को निरस्त करके उसे आजीवन सजा में तब्दील किया लेकिन जहाँ तक कानून में प्रावधान है उस प्रावधान को सुप्रीमकोर्ट निरस्त नहीं कर सकती । चूँकि इसके लिए केन्द्र सरकार को इस कानून को निरस्त करने के बारे में सोचना चाहिये !
मैं, आपको एक और खुशखबरी देता हूँ कि सिर्फ कक्षा – 4 तक पढ़ाई किये हुए एक किसान-मजदूर ने देश की अनोखी बैलगाड़ी बनाई है जो हाईड्रोलिंक है – नाम रखा है “आरुणी” । बैलगाड़ी – जिसकी खासियत ये है कि इसमें चार पहिये हैं जिससे बैल के कंधों पर वजन नहीं आता और हाइड्रोलिक होने से मिट्टी-खाद भरकर किसान योग्य स्थान पर खाली कर सकता है । गुजरात के जूनागढ़ के मालिया-हाटी तहसील के अमृतलाल अग्रावत* अभी 72 वर्ष के हैं उन्होंने यह आविष्कार किया है । सूरत के वीर नर्मद* दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी में दो दिवसीय प्रदर्शन में उनके इस आविष्कार को देखकर सभी दंग रह गये । उन्होंने 2010 में इसे ‘पेटेन्ट’ भी करवा लिया है । कम पढ़े-लिखे अमृतलाल अग्रावत ने खेती में उपयोगी हो सके ऐसे कई उपकरण बनाए हैं । 15 सांती,* कुएँ से पानी खींचते समय थकावट न हो ऐसी गरगड़ी, … ऐसे कई आविष्कारों के लिए भू. पू. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा उनको लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी दिया गया था । इसके अलावा वर्ष 2016 में उनको राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में सोलह दिन के लिए आतिथ्य दिया था ! कम-पढ़े लोग भी भारत में बड़े-बड़े वैज्ञानिक न कर सकें ऐसे आविष्कार कर सकते हैं और उनके आविष्कार समाज के लिए काफी उपयोगी हो सकते है यह बात सत्य है ।
अब एक ओर बात कि जेलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध होने के बावजूद कई जेलों में अवैध रूप से मोबाइल चलाते हैं इसकी खबरें आती रहती हैं । चूँकि मोबाइल फोन से होनेवाले नुकसान के प्रति अवाम उतना जाग्रत नहीं है ये वास्तविकता है । जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक होने से सहज ही कैदी मोबाइल फोन से होनेवाले नुकसान से बचे रहते हैं । चूँकि कुछ कैदी पाँच-पच्चीस मिनट अपने परिवार का हालचाल पूछने को मिल जाए तो इतने से संतुष्टि का अहसास करते हैं और उसके लिए एक समय का भोजन न मिले तो चल सकता है पर बात न हो तो मन विचलित हो जाने का अहसास करते हैं और जेल में किसी कैदी को सर्वथा संसार से, समाज से कट ऑफ ही कर देने का कोई ठोस नियम नहीं है । कैदी भी मानव है और हर मानव एक सामाजिक प्राणी है । उसके समाज के साथ के कनेक्शन बने रहने चाहिए और वे संबंध जितने स्वस्थ होंगे, उतना ही उसमें संवेदनशीलता बरकरार रहेगी और उससे उसके सुधार की संभावनाएं भी अधिक होगी इसलिए मेरी मान्यता है कि जेल प्रशासन को समाज के साथ कारावास में रहे हुए कैदी का संवाद, संबंध बरकरार रहे, बढ़ता रहे ऐसे प्रयत्न करने चाहिए । कैदी को रॉबिन्सन क्रुझों की तरह किसी टापू पर रख दिया हो ऐसे देश, दुनिया, समाज से डिस्कनेक्ट रखना उचित नहीं ।
सुना है कि अभिनेता रजनीकांत और फिल्मकार शंकर की लगभग 600 करोड़ की लागत की फिल्म ‘2.0’* सेंसर द्वारा प्रमाणित फिल्म अभी-अभी आई है । खबर है कि इस फिल्म में एक दृश्य है । जिसमें संकेत है कि मोबाइल फोन के जो टावर लगते हैं उस टावर से जो आणविक* विकिरण होता है वह सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक है । बहरहाल, इस प्रकरण में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अधिक उपयोग ही हानिकारक है । विशेषज्ञों की राय है कि मोबाइल से भी विकिरण होता है इसलिए जरूरी है कि मोबाइल को आप कमीज के या पतलून की जेब में नहीं रखना चाहिये । कमर में बंधे बेल्ट के पॉकेट में रखना चाहिए क्योंकि कभी-कभी कमीज की जेब में रखा मोबाइल भी फट जाता है । सबको मालूम है कि हवाई सफर में मोबाइल बंद रखने की हिदायत दी जाती है क्योंकि उससे निकलनेवाली विकिरणें हवाई जहाज के इंजन में खराबी पैदा कर सकती है । अनेक मोबाइल प्रेमी इस हिदायत को नहीं मानते और सभी यात्रियों को संकट में डाल देते हैं । कल्पना की जा सकती है कि मोबाइल पर फिल्म देखना कितना हानिकारक हो सकता है । फिल्म केवल सिनेमा के परदे पर ही देखी जानी चाहिए – मोबाइल में नहीं । मोबाइल का इस्तेमाल लोगों को आलसी बनाता है । चलायमान शरीर धीरे-धीरे जड़ होते जा रहे हैं और इस कारण बीमारियाँ फैल रही है । कुछ लोग नाश्ते के साथ चार-पाँच गोलियाँ भी निगलते हैं, दोपहर के भोजन के साथ आठ कैप्सूल और फिर रात के भोजन के साथ फिर गोलियाँ, कैप्सूल और सिरप गटकते हैं । प्रभु जोशी और सिद्धार्थ जोशी जैसे पेंटर को ऐसी मानव कृति बनाना चाहिए जिसमें टेबलेट और कैप्सूल हों और नसों में सिरप प्रभावित हो रहा हो ऐसी राय जयप्रकाश चौकसे ने दी है ।
अब खबर है कि वैज्ञानिक लोग टेलीपैथी का अध्ययन कर रहे हैं । टेलीपैथी का अर्थ होता है कि एक ही विचार या भावना एक ही समय में दो प्रियजनों के बीच जन्मीं हो । इस शोध का पूर्व अनुमान शायर निदा फाजाली को हो गया था । वे लिखते हैं –
“मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार ।
दिल ने दिल से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार ।।”
मैंने तो बहुत बार देखा है कि मैंने जिसको याद गहराई से किया है अगले सप्ताह की मेरी मुलाकात में वह इंसान मेरे पास आया है । पिछले पाँच साल में एक भी बार मेरे पास नहीं आनेवाला इंसान जिसके साथ बचपन में मैं खेला-कूदा था, बचपन की धमाल मस्ती की थी, उस इंसान को याद किए हुए अभी चार-पाँच दिन ही हुए थे कि उस इंसान को, आज की मुलाकात मैं मैंने देखा । वह मुझसे बात करने के लिए चार घंटे की सफर करके पहुँचा था । मैंने उससे बात की । खैर, रश इतनी थी कि मैं यह भी नहीं कह पाया कि मैंने तुझे याद किया और तू मेरे सामने ! ऐसा कईयों बार हुआ है मेरे साथ । तो टेलीपैथी आज के समय भी काम करती है । ये बात मानने के लिए मेरे पास कई प्रमाण हैं । मंदसौर (म.प्र.) के पास मेरे पुराने मित्र रहते हैं । वर्षों पहले जब मोबाइल फोन नहीं आया था और टेलीफोन से ही था उस दौरान मैंने गुजरात के साबरकांठा आश्रम के रूम में उसे याद करते हुए, बुलाते हुए तीन-चार बार पुकारते हुए उसे आवाज दी थी । थोड़ी देर बाद फोन किया तो उठाया नहीं । बाद में, दूसरे दिन फोन लगाकर बात की तो उसने कहा – क्या आप यहाँ कल रात आये थे ? आपकी आवाज मैंने सुनी, आप मुझे तीन-चार बार बुलाए । मैंने नीचे जाकर, यहाँ-वहाँ आपको बहुत ढूँढ़ा – पर आप कहीं दिखे नहीं, मिले नहीं । तब मैंने कहा – हाँ, मैं मन से आया था, तन से नहीं । मैंने आवाज दी थी, पुकारा था – ये सच है । तो टेलीपैथी का प्रयोग तो मैंने वर्षों पहले किया था, सफल हुआ था । मुझे आज भी वो घटना याद है । मेरे वे मित्र आजकल वृंदावन में रहते हैं । तो मोबाइल के इस युग में लाभ-हानि के बहीखाते को भी आप देखते रहें और टेलीपैथी के प्रयोग करें । संभव है टेलीपैथी में सफल हो जाने के बाद मोबाइल से अधिक सरल और संवेदनशील संवाद स्थापित** करने में हमें कामयाबी मिल जाए – ये संभव है । ऐसा मुमकिन हो सकता है चाहे कुछ वक्त लग सकता है इसके लिए !
एक अच्छी खबर और आई है कि अजंता इलोरा जैसी विश्व धरोहर वाले महाराष्ट्र के औरंगाबाद में भारत का दूसरा सबसे बड़ा रामकृष्ण ध्यान मन्दिर नौ साल में बनकर तैयार हुआ है । 28 करोड़ की लागत आई है और 17 नवम्बर, 2018 को इसका लोकार्पण हुआ है । विश्वभर में फैले रामकृष्ण मिशन के 350 से अधिक साधु-संत शामिल हुए थे लोकार्पण के अवसर पर । यहाँ चार वास्तुकला का संगम हुआ है । 100 फीट ऊँचा मंदिर है । औरंगाबाद में मेरे पिताजी के साथ सुबह के प्रातःभ्रमण के लिए मैं निकलता था – वे यादें ताज़ा हो आई ! लालकृष्ण अडवाणी औरंगाबाद आश्रम में बापूजी के दर्शन करने आये थे और लंबे समय तक विभिन्न विषयों पर बापूजी व अडवाणी जी के बीच चर्चा हुई थी !
अब, गज़लकार राजेश रेड्डी की गज़लें जो शेर रूप में है । कुछ प्रस्तुत करके मेरे पत्र की दिल की बात को विराम देता हूँ । आप, अगले पत्र की प्रतिक्षा कीजियेगा… ठीक है ?
हाँ, विश्वगुरु ओजस्वी का 100 वाँ अंक बहुत सुन्दर मिला है मुझे ! आपको भी मिला होगा वरना मँगवा लीजियेगा । पूरी पत्रिका फोर कलर है… आठ साल से प्रकाशित हो रही है । आप आजीवन सदस्य बनेंगे तो हर साल रिन्यू (नवीनीकरण) की झंझट नहीं !

● मस्जिदों पे जान दी कुरबाँ शिवालों पर हुए,
कितने काले तजरुबे उजली किताबों पर हुए
सर तलक तो बाद में आई मेरे दुश्मन की तेग*
उसके पहले अनगिनत हमले खयालों पर हुए
फायदे नुकसान में हमने न उलझाया दिमाग
अपने सारे फैसले दिल के इशारों पर हुए
तू जवाबों से हमारे मुतमइन हो न हो
हम फिदा ऐ जिंदगी ! तेरे सवालों पर हुए…
“वाह ! क्या बात है !”

चलो, एक और पढ़ लीजिए…

● अपने भी ख्वाब देखें, बिखर तो नहीं गये
जीते-जी हम भी जिस्म में मर तो नहीं गये
कोई हमें भुला के भी जीता है जिंदगी
हम भी किसी की याद में मर तो नहीं गये
क्यों इन दिनों नहीं है जमाने से कुछ गिला
औरों के साथ हम भी सुधर तो नहीं गये !

लो, एक और पढ़िये –

● चमकती चीज को सोना समझकर
बहुत पछताए किसी को क्या समझकर
न जाने कितनी सारी बेड़ियों को
पहन लेते हैं हम गहना समझकर
हमारी प्यार की शिद्दत न पूछो
समुंदर पी गए कतरा समझकर
समुंदर के खजाने मुन्तझिर थे
हमीं उतरे नहीं गहरा समझकर…

पत्र को विराम देता हूँ, अगले की प्रतिक्षा कीजिए ! देखो, पत्र आता है या मैं आता हूँ…

नारायण साँई,
28 नवम्बर, 2018

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