जब हम खुश होते हैं, चीजें बदल जाती हैं ! 

जब हम खुश होते हैं, चीजें बदल जाती हैं ! 

जब हम खुश होते हैं, चीजें बदल जाती हैं ! 

यह लेख पढ़ रहे आपमें से अधिकांश लोगों के पास कुछ किताबें जरूर होंगी, पर कितनों ने अपने अतिथि गृह को उनके लिए पुस्तकालय की तरह खोलने का निर्णय लिया है । शिल्पा सावंत उनमें से एक हैं और उनके पास 850 कॉमिक किताबें हैं । गृहिणी और उत्सुक पाठक शिल्पा सामान्य-सा जीवन जी रही थी, इस बीच गाँव के कई लोगों ने जब मेहमानों के लिए दरवाजे खोले कि वे आएँ और उनके संग्रह की किताबें पढ़े, तो शिल्पा भी अचानक इसकी सदस्य बन गई । एक दिन उनके गेस्ट रूम में एक गेस्ट ने आकर किताबें पढ़ना शुरू कर दीं, उनके इस रूम का अलग रास्ता था । वह बहुत बाद में देखने आई कि गेस्ट को कुछ जरूरत तो नहीं । जब शिल्पा ने चेहरा देखा, तो वह हक्की-बक्की रह गई । वो बापू थे ! वह अकेले बैठे थे, कोई सहायक नहीं, कोई प्रशंसक नहीं । अपनी किताब में खोए हुए, उन्होंने अपना सिर उठाया और शिल्पा का चेहरा देखा । उन्होंने उसे विश किया और कुछ देर बातचीत की । जाने से पहले उन्होंने शिल्पा से पोस्टल एड्रेस लिया और बाद में उसके पुस्तकालय के लिए अपने हस्ताक्षर करके दो किताबें भेजीं । यह 2022 में हुआ ! भरोसा नहीं हो रहा ? आगे पढ़ें । 

हाँ, वह बापू थे, जैसा संजय दत्त ‘लगे रहो मुन्नाभाई में’ प्यार से उन्हें बुलाते थे, वो बापू की भूमिका निभानेवाले प्रसिद्ध अभिनेता, नाटककार और लेखक दिलीप प्रभावलकर थे । 

शिल्पा का घर भिलार गाँव में इन 35 घरों में एक है, यह महाराष्ट्र के दो प्रसिद्ध हिल स्टेशन महाबलेश्वर-पंचगनी के बीच है, जहाँ से स्ट्रॉबेरीज का निर्यात होता है । भिलार में सबसे रसीली स्ट्रॉबेरी पैदा होती हैं । कृषि से अच्छी आय के बावजूद इस गाँव ने मिलकर ऐसे संजीदा पर्यटकों को आकृष्ट करने के लिए सामूहिक योजना बनाई, जो कि आराम करते हुए पढ़ना चाहते हैं, ना कि प्रकृति का लुत्फ उठाए बिना सिर्फ सेल्फी में व्यस्त हों । करीब 7 सालों में जब से पुस्तकालय के लिए घरों के दरवाजे खोलने का कॉन्सेप्ट आया, यह ‘विलेज ऑफ बुक्स’ (पुस्तकांचं गाव) कहलाने लगा । एक अन्य रहवासी शशिकांत भिलारे ने जब ये कॉन्सेप्ट सुना, तो घर का पूरा ऊपरी फ्लोर विलेज ऑफ बुक्स के ऑफिस के लिए दे दिया, यहाँ तक कि उन्होंने दो साल पहले हुई बेटी की शादी में मेहमानों को रिटर्न गिफ्ट में दो-दो किताबें दीं । आज आप इस ऑफिस में आएँ, तो वे आपको सारे 35 घरों का नक्शा देंगे और बताएँगे कि कौन-सी किताबें उनके पास हैं । रुचि के आधार पर पसंद की किताबें देखने जा सकते हैं । इस तरह ‘बापू’ मतलब दिलीप प्रभावलकर यहाँ आए । इस छोटे से गाँव में दस और घर इसका हिस्सा बनना चाह रहे हैं । 

जब आप इस गाँव में आएँगे, तो महिलाएँ आकार के अनुसार स्ट्रॉबेरी छाँटने में व्यस्त होंगी, पुरुष खेतों में व्यस्त होंगे, पर स्कूल जानेवाले बच्चों में कोई आएगा और आपके लिए लाइब्रेरी खोल देगा कि आप गिरते तापमान के साथ सूरज की किरणों का लुत्फ उठाएँ और किताबें पढ़ें । आज उन 35 घरों में करीबन 35 हजार किताबों का संग्रह है और शशिकांत जैसे लोग अपने सार्वजनिक पुस्तकालय में जोड़ने के लिए नई पुस्तकों का इंतजार करते हैं । इस कॉन्सेप्ट ने उस गाँव में काफी बड़े बदलाव किए हैं । कुछ लोगों ने पाठकों के लिए घर पर रुकने की व्यवस्था शुरू कर दी है, जो कि देर शाम या रात में रुककर किताबें पढ़ना जारी रखना चाहते हैं, कुछ लोगों ने स्थानीय व्यंजन भी बेचना शुरू कर दिया है । सरकार ने सड़कें बनाई हैं, स्ट्रीट लाइट्स लगाई हैं, साफ-सफाई की बेहतरी की है और यहाँ तक कि पुस्तक विमोचन और अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए सभागार भी बनाया है । 

फंडा यह है कि हम अक्सर सोचते हैं कि जब चीजें बदलेंगी, हम खुश हो जाएँगे । पर सच ये है कि जब हम खुश होते हैं और उस हिसाब से काम करते हैं, तो चीजें भी बेहतर हो जाती हैं ।

  • एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

 

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