भगवान का नाम, गुरु का मंत्र साथ देता है !
भगवान का नाम, गुरु का मंत्र साथ देता है ।
(पू. श्री नारायण साँईं जी के सत्संग प्रवचन से )
भगवान का नाम, गुरु का मंत्र साथ निभाता है, बैंक बैलेंस साथ नहीं निभाता है । जय रामजी की… वो FD तो धरी की धरी रह जाएगी । वो बॉन्ड फंड सब पड़े के पड़े रह जाएँगे । ये गहने-गाँठें सारे लॉकरों में रख दो । ये साथ नहीं चलते । ये असली कमाई है न, जिसको रखने की मेहनत नहीं है । संभालने का कोई टेंशन नहीं है । ये असली खजाना जो गुरुपूनम पर आपको देने के लिए मैं भागा-भागा आया हूँ भाई । इसीके बारे में मीरा गाती है ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो,
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु !
किरपा करी अपनायो ।
ये उनकी कृपा रही कि उन्होंने हमें स्वीकार किया । इसीलिए मैं तो समितिवाले भाईयों से खास ये कहना चाहता हूँ कि – ‘भाई ! इसका महत्त्व आप लोगों को समझाओ । जितना आप स्वयं समझोगे, उतना आप लोगों को समझाओगे । भई, कोई आपको पाँच हजार दे रहा है, कोई ग्यारह हजार दे रहा है, कोई लाख रुपया दे रहा है, तो ये समिति के ऊपर या बापूजी के ऊपर या हमारे ऊपर या इस आश्रम के या सेंटर के ऊपर कोई मेहरबानी नहीं कर रहा है । वो अपना भला कर रहा है । भला ! उसको लाख बार गरज हो तो वो देवे | अभागे आदमी का धन सेवा में लग ही नहीं सकता । लोग कवर देते, दक्षिणा देते, कपड़ा देते, काजू देते, मिठाई देते… हम कहते – ‘हम भाई मिठाई नहीं खाते और खाएँगे तो आधा पेड़ा – एक पेड़ा । कभी खाया महीने, दो महीने में तो बहुत हो गया । मिठाईयों का मुझे शौक नहीं । ये काजू-बादाम बहुत आते हैं । मैं इनको खाता नहीं कभी । खाना भी हो तो बापूजी बोलते हैं एक दिन में सात काजू से ज्यादा मत खाओ और बादाम पाँच रात को भिगोकर सुबह छिलके उतारकर चबा-चबा कर खाओ । तो मुझे जरूरत नहीं है । आप इतना सारा क्यों देते ? किलो-किलो, दो-दो किलो, ये अखरोट, बादाम, ये पूरा थैला भर के…|’ वो सज्जन ने बोला – ‘स्वामीजी ! आपको जरूरत है इसीलिए हम थोड़े देते हैं’ । उसकी बुद्धि देखो । ‘आपको जरूरत है इसीलिए हम थोड़े देते हैं । जरूरतमंद तो बहुत हैं । आपको आवश्यकता है या आपको इन चीजों की जरूरत है, इसीलिए हम नहीं देते । हमको जरूरत है इसलिए आपको देते । ये जरूरत हमको है । हमें आपसे चाहिए और आप दे रहे हैं और ये हम क्या दे रहे हैं ?’ कहाँ तो अष्टावक्र बारह साल के, टेढ़ी टाँगे, नाटा कद और शरीर के अंदर आठ तो फॉल्ट हैं । उनको श्राप मिला था । अभी तो माँ के पेट से निकला नहीं और जबान लड़ाता है | निकलेगा तो क्या करेगा ? और बाप से लड़ाता है जबान । आठ महीने का है । तेरे को आठ खोड़ हो जाएँगे और आठ खोड़ हो गए ।
राजा जनक अष्टावक्र से कहते हैं – ‘हे गुरुदेव ! कृपा करके ये मेरा जो राज्य है न, उसको आप स्वीकार करो । मुझे नहीं चाहिए । ये राजा का पद आपको दिया और रत्नजड़ित मुकुट सोने का वो भी आपको अर्पण है । सोने का सिंहासन आपका है । मेरा परिवार, मैं स्वयं और जो समस्त राज्य है वो सारा राज्य का सब कुछ मैं आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ । इसे स्वीकार करो । ये मत समझना कि आपने जो दिया उसके बदले में मैं ये सब दे रहा हूँ । ये कोई व्यापार थोड़े है कि भई, हमने इतने रुपये दिए, उसके बदले में तुमने अपना प्रॉफिट मार के चीज दे दी । तुमने कम में खरीदी । उसको दुगुना कर दिया । तीन गुना कर दिया । जाके देश-विदेश बेच दिया और छाती फूला ली कि अजी, हमने तो पचास हजार में ली थी और ये हम तो डेढ़ लाख में बेचकर आए । ये कोई व्यापार थोड़े है कि गुरुजी ज्ञान देते हैं उसको तुम व्यापारिक ढंग से, बनिया बुद्धि से तोल रहे हो कि हमारे को गुरुजी ने कौन-सा फायदा करवाया । उस हिसाब से हम दक्षिणा देंगे । ये कोई व्यापार थोड़े है | गुरुदेव ! आपने जो दिया वो तो शाश्वत है । मृत्यु का झटका लगा और जो भी हमने इकट्ठा किया था वो सारा का सारा छूट जानेवाला है । मिट जानेवाला… शरीर भी जहाँ साथ नहीं निभाता, वहाँ आपका ज्ञान साथ निभाता है । ये राज्य साथ नहीं निभाएगा । आपका ज्ञान, जन्म जन्मान्तरों के दुष्चक्र से मुक्त करायेगा । हम कृतज्ञ हैं, ऋणी हैं । आपका दिया हुआ शाश्वत है, नित्य है और हम जो देंगे नश्वर है – अनित्य है । आपने जन्म जन्मान्तरों के दुःख से सदा के लिए मुक्त किया – आपकी जय हो !!!