जीवन में बार-बार असफलता मिलने पर क्या करें ?
जीवन में बार-बार असफलता मिलने पर क्या करें ?
तुम्हारे विचार ठीक हो, तुम्हारी दृष्टि स्पष्ट हो, तो सफलता तो तुम्हारे चरणों की दासी है ।
मायूस न हो, इरादे न बदल,
तकदीर किसी वक्त भी बदल सकती है ।
दस बार तुमने हानि उठाई, तो यह जरूरी नहीं है कि ग्यारहवीं बार भी तुमको हानि ही उठानी पड़े । पंद्रह बार तुमको अपने किसी कार्य, बिजनेस में नुकसान हुआ तो फिर से सोलहवीं बार कोशिश करो | ये संभव है कि पंद्रहवीं बार का घाटा भर जाए सोलहवीं बार में । तुम दो बार परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए, फिर से तीसरी बार प्रयास करो, क्यों डरते हो ? किसीको नेता बनने की इच्छा है समझो, कोई चुनाव लड़ा और हार गया । बाहर से भले हारा । उसे चाहिए कि भीतर से न गिरे । दूसरी बार लड़े, भले हार जाए, तीसरी बार लड़े, चौथी बार लड़े, पाँचवीं बार लड़े । आखिर जीतेगा, और जीतेगा ही ।
लिंकन के जीवन का उदाहरण देखो तो यही है । वे कईयों बार चुनाव लड़े-हारे, लड़े-हारे, अंततः फिर ऐसा जीतो, ऐसा जीतो, कि अदम्य मनोबल, अदम्य साहस भीतर भर गया । बाहर का हारना मनुष्य को उतना कमजोर नहीं करता, जितना वो पहले भीतर से हारता है – भीतर से तुम जीतते रहो । लाभ-हानि तो ठीक है, यश और अपयश, जय और पराजय, यह तो तुम्हारे सामने खिलवाड़ है । ये तो खिलौने हैं । ऐसा समझो ।
मेरी कार जा रही थी, तभी एक बहन दौड़ी । मैंने कहा – ‘गाड़ी रोको ।’ मैंने पूछा – ‘क्या है ?’ तो कहा – ‘आशीर्वाद दीजिए ।’ मैंने कहा – ‘कैसा आशीर्वाद ?’ कहा कि – ‘मैं मरना चाहती हूँ ।’ तो मैंने कहा – ‘मेरे पास ऐसा आशीर्वाद नहीं हैं ।’ किसीने मुझसे आज तक – ‘मर जाना है’ – ऐसा आशीर्वाद नहीं माँगा । मैंने कहा – ‘मैं इसे (ऐसे आशीर्वाद) रखता ही नहीं । मेरे पास इसका स्टॉक ही नहीं है ।’ माँग, माँगकर ऐसा माँगा कि मर जाएँ ? भगवान ने इतना अच्छा शरीर दिया, आँखें दी, कान दिए, योग्यता दी, बुद्धि दी और तुम ईश्वर के दिए हुए अनमोल शरीर का अंत करना चाहते हो ?
भगवान का दिया हुआ शरीर, भगवान की भक्ति में लगाओ । अपनी योग्यता का सदुपयोग करो । आत्महत्या एक महान पाप है । एक घातक पाप है, यह आत्महत्या । जो लोग घबराकर कहते हैं कि हम मर जाएँगे । मैं कहता हूँ – ‘मरकर भी नहीं पाया चैन, तो कहाँ जाओगे ? भूत होकर भटकते रहोगे । इसलिए मरो मत । यह भूत-प्रेतों के रूप में इधर-उधर भटकने जैसा है । यह बहुत बड़ा पाप है ।’
शास्त्रों में इस बात की कड़ी निंदा की गई है कि आत्महत्या करनेवाले व्यक्ति की लाश को रस्सी से बाँधकर सबके सामने सब देखें, उस ढँग से सड़क पर घसीटकर श्मशान ले जाना चाहिए । तब लोगों को पता चलेगा कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए । जो आत्महत्या करते हैं, उनके लिए लिखा हुआ है कि उनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाए ? तो उनकी लाश को बाँधकर बीच बाजार में से घसीटकर ले जाएँ ।
मेरी कार मुंबई में किसी सिग्नल पर रुकी । अक्सर चौराहों पर सिग्नल होते हैं जहाँ पर लाल, हरी, पीली बत्ती होती है । तो मेरी गाड़ी सिग्नल पर रुकी थी । इतने में मैंने देखा कि एक मेरी कार के पास एक किन्नर आकर खड़ा हो गया । किन्नर कि कुछ दो । मैं हँसा । मेरी कार में चॉकलेट पड़ी थी, तो मैंने उसे दिखाई । उसने कहा – यह भी चलेगा और हँसकर ले गया । अब किन्नर भी आत्महत्या करने का नहीं सोचते हैं । अक्सर वे न व्यापार करते है, न काम करते है, कुछ लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, फिर भी वह आत्महत्या के बारे में नहीं सोचते और आजकल के युवक-युवतियाँ देखो, अगर थोड़ा भी असफल या परेशान हो जाएँ, तो अपनी जिंदगी खत्म कर देते हैं । क्या बात है ! जरा-सी नौकरी नहीं मिली, जरा कोई व्यवसाय नहीं हुआ या वित्तीय परेशानियों (आर्थिक उथल-पुथल) के कारण जीवन खत्म कर देते हैं । विवाहित या विवाहिता ने अपना जीवन खत्म कर किया । अब तो फिर कुछ नया सामने आया है कि पति ने पत्नी को जहर दिया, बच्चों को जहर दिया और खुद भी जहर पीकर मर गया । जब दरवाजा खोला, तो चारों मर चुके थे । यह अज्ञानता का फल है । समाज में अशांति, नासमझी, असहिष्णुता बढ़ रही है, चिंता बढ़ रही है, तनाव बढ़ रहा है, आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं, घर में नई-नई समस्याएँ पैदा हो रही हैं, शरीर में नई-नई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं, तनाव और तो और हाइपरटेंशन । यह सब किसका परिणाम है ? यह अज्ञान का फल है । सत्संग का अभाव है इसलिए ये अज्ञान सत्संग से ही दूर होगा । यदि सत्संग, ऊँचे सद्गुरु का सत्संग सुनने का अवसर मिले, तो सैकड़ों, हजारों, लाखों नहीं, करोड़ों महत्त्वपूर्ण कार्य सामने हों, फिर भी उन सबको एक तरफ रखकर सत्संग सुनना (श्रवण करना) चाहिए । कहा भी है :-
शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्त्रं स्नानमाचरेत् ।
लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् ।।
कि सौ काम छोड़कर भोजन कर लो, हजार काम छोड़कर स्नान कर लो, लाख काम छोड़कर दान-पुण्य, सत्कर्म कर लो और करोड़ों-करोड़ों काम छोड़कर हरि का भजन कर लो । सत्संग कर लो ।
-पूज्य श्री नारायण साँईं जी
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