अक्षय तृतीया पर पूज्य साँई जी का दुर्लभ अक्षय संदेश
अक्षय तृतीया पर पूज्य साँई जी का दुर्लभ अक्षय संदेश
आज अक्षय तृतीया का परम पावन दिवस है और शास्त्रों में इसकी बड़ी भारी महिमा है । आज का दिन अक्षय तृतीया भगवान विष्णु के छठे अवतार थे भगवान परशुराम, उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है । उन्होंने पृथ्वी पर से अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की थी और इसलिए ये दिन अधर्म पर धर्म के विजय का दिन माना जाता है । महाभारत का लेखन का प्रारंभ भी इस दिन से शुरू हुआ । वैदिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास ने भगवान गणपति के समक्ष महाभारत की कथा का वर्णन करना शुरू किया और इसी कथा के अंश रूप में हमें विश्व के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक ऐसी श्रीमद्भगवद्गीता की प्राप्ति हुई, वो भी आज के दिन जहाँ से भगवद्गीता ही वो महाभारत है और महाभारत का लेखन आज के दिन शुरू हुआ, फिर गंगाजी का अवतरण ।
राजा भागीरथ ने तपश्चर्या की और पूर्वजों के मोक्ष के लिए सालों तक कठोर तपस्या की और भक्ति से प्रसन्न होकर पवित्र गंगा नदी पृथ्वी पर उतरी । तो आज के दिन गंगा स्नान करने से भी सारे पापों में से मुक्ति होती है और जो गंगा नदी तक जा नहीं सकते, तो वो जिस पानी से स्नान करें, उस पानी में मन ही मन गंगाजल का भाव रखें और गंगाजी का नाम लें और ‘हर हर गंगे’ करके उस पानी से स्नान करें, तो उनको भी पुण्य की प्राप्ति होती है । तो गंगा का स्मरण आज के दिन कई पाप-तापों से हमें मुक्त करता है । और भी आज के दिन की महिमा ये है कि भगवान कृष्ण के परम मित्र सुदामा इसी दिन उनसे मिलने के लिए द्वारिका पहुँचे थे । वो कौन-सा दिन था ? अक्षय तृतीया का दिन था । आज का दिन था ।
: तो सुदामा की दरिद्रता, उसकी गरीबाई देख के, लेकिन उसके मन की अनन्य भक्ति देख के भगवान कृष्ण बहुत अभिभूत हुए और सुदामा के द्वारा लाए गए तांदुल के बदले में भगवान ने उनको ढेर सारी संपत्ति और सुख, समृद्धि अर्पण किया, तो वो भी आज का ही दिन है । फिर है अन्नपूर्णा, कि देवी पार्वती के स्वरूप माता अन्नपूर्णा अक्षय तृतीया के दिन ही प्रगट हुई । पौराणिक कथा ऐसी भी है कि भगवान शिव ने भिक्षा मांगी, तब माता अन्नपूर्णा ने उनको भोजन कराया । तो इस दिन पर विश्व में अन्न और पोषण की… अगर हम अन्नपूर्णा का नाम स्मरण करें और उनकी उपासना करें, तो हमारे घर पर कभी अन्न, धन-धान्य की कमी नहीं होगी । अन्न से हमारे भंडार भरे रहेंगे और अन्नपूर्णा की कृपा हमारे ऊपर उतरेगी । तो ये भी एक विशेष महिमा है ।
दूसरी महिमा ये भी है कि पुराणों में कहा है कि अक्षय तृतीया के दिन त्रेता युग की शुरुआत हुई और ये वही युग है कि जिस त्रेता युग में भगवान राम और भगवान परशुराम ने त्रेता युग में अवतार धारण किया था । तो ये युग परिवर्तन के कारण इस दिन का सांस्कृतिक महत्व भी खूब बढ़ जाता है । फिर इसी दिन भगवान शंकर ने कुबेर को स्वर्ग के खजांची के रूप में नियुक्त किया था और इसी अक्षय तृतीया के दिन किसी को भी नई आर्थिक शुरुआत करनी हो, कंपनी बनानी हो, फैक्ट्री लगानी हो, कोई नया व्यापार, बिजनेस शुरू करना हो तो आज के दिन अगर वो शुरू करता है, तो वो जो है सफल होने की संभावनाएँ उसकी बढ़ जाती है । बहुत कम चांसेस रहते हैं कि वो बिजनेस और वो व्यापार कभी बंद हो । इसलिए कोई नया व्यापार, धंधा, कंपनी आदि की स्थापना भी आज के दिन करने से ये बिन कहा, बिन देखा मुहूर्त माना जाता है कि सब मुहूर्त अनुक…
इसीलिए लोग इन्वेस्टमेंट भी आज के दिन करते हैं । कोई शेयर खरीदते हैं । कोई सोना, चाँदी आदि खरीदते हैं तो ये भी काफी अच्छा है । दूसरा, कि अक्षयपात्र का वरदान कि पांडव जब वनवास में थे, तब भगवान कृष्ण ने उनको अक्षयपात्र अर्पित किया था । तो इस अक्षयपात्र की ये खासियत थी कि उसमें से भोजन कभी खुटता नहीं था, तो यह घटना मेहमान गति यानी ‘अतिथि देवो भव’ के मूल्य को समझाती है । तो ऐसा ये विशेष दिन है और आज का दिन, रात भी उतना समय और दिन भी उतना समय, दोनों दिन और रात का जो काल है, वो दोनों जो है बराबर-बराबर माने गए हैं, ऐसा ये दिन है ।
और इस दिन की बहुत लंबी-चौड़ी कथाएँ भी है और बाकी ये जो है वो काफी अच्छा था । हमारी संस्कृति में वैशाख सूद त्रिज मतलब कि अखात्रिज गुजराती में कहते हैं । इसको हिंदी में अक्षय तृतीया कहते हैं । तो महाभारत का युद्ध इसी अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण हुआ था और जगन्नाथपुरी और अहमदाबाद में भी जो निकलने वाली रथयात्रा के जो रथ है, उसके निर्माण का कार्य भी अक्षय तृतीया के दिन से प्रारंभ किया जाता है । स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिरों में अक्षय तृतीया के दिन भगवान स्वामीनारायण भगवान को चंदन के वस्त्रों का भव्य श्रृंगार करने का प्रारंभ किया जाता है और किसान लोग भी अक्षय तृतीया के दिन खेत में हल चलाने का प्रारंभ करते हैं और शुकन का दिन मानते हैं । अक्षय तृतीया के दिन अक्षत कहते कहते चावल से यानी अक्षत से भगवान का पूजन किया जाता है । इसकी भारी महिमा है और सोने-चाँदी की खरीदी भी…
इसका भी आज ही के दिन अवतरण हुआ था और आज के दिन ही गंगोत्री और यमुनोत्री के जो द्वार है ना… आज के दिन ही खोले जाते हैं । तो आज के दिन मंत्रजाप, धर्मकार्य, पुण्य का कभी क्षय नहीं होता और उसका फल कई जन्मों तक मिलता रहता है । आज अक्षय तृतीया के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी ने एक वर्ष की तपस्या के बाद एक गिलास गन्ने का रस पी के उसको पूर्ण किया था, ऐसा ये दिन है । और आज के दिन पितरों के निमित्त दान और तर्पण करने से शुभ कार्य सफल होते हैं और पितृलोक जो हैं, वो तृप्त होते हैं और हवन, स्नान और पूजन का जो पुण्य है, वो भी नष्ट नहीं होता । वो भी लंबे समय तक बनता रहता है और गृह प्रवेश के लिए भी ये दिन शुभ है और गणपतिजी ने और व्यास मुनि ने महाभारत की आज रचना की थी और आज ही के दिन कृष्ण ने पांडवों को अक्षयपात्र दिया था और गीताजी का पाठ भी बहुत पुण्यदायीं है और…
तो जिनके भी घर में दरिद्रता है, वो आज के दिन अगर लक्ष्मीजी के मंत्र और भगवान विष्णु का मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ इसका अगर जप करेंगे, तो उनका घर में बरकत होगी और लक्ष्मी होगी और अक्षय तृतीया जन्म-जन्म तक उसका पुण्य है, वो नाश नहीं होता और आज आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने कनकधारा स्तोत्र की रचना भी आज ही के दिन की थी । इसलिए इस विशेष दिवस पर दान, पुण्य, सत्कर्म, होम, हवन, पवित्र नदियों में स्नान, गंगाजी का स्मरण आदि जरूर करें । अन्नपूर्णा माता का स्मरण करें । गुरुदेव का स्मरण करें और उनके दिए हुए मंत्र का जप करें, तो ये विश्वास रखकर कि हम जो उपासना करते हैं, उस उपासना का अवश्य हमें फल मिलेगा ।
एक बार परशुरामजी थे, उन्होंने साधु वेश में घर गए, तो बनिये ने परशुरामजी को आसन दे के भोजन कराया, तो परशुरामजी बोले – कि हे धनिक, तू अभी तक अक्षय तृतीया के महत्व से अनजान है । आज गंगा स्नान करो, पितृ तर्पण करो, दया, दान करके पुण्य प्राप्त करो, क्योंकि आज के दिन का पुण्य कभी क्षय नहीं होता । जन्मों-जन्मों तक तुझे ये पुण्य काम लगेगा । तो ये अक्षय तृतीया की महिमा सुनकर उस बनिये ने ये व्रत करने का निर्णय किया और आज के दिन शुक्ल पक्ष की तीज के दिन गंगा स्नान करके, साधु-संतों को भोजन कराया और दान-दक्षिणा किया । तो ब्रह्म भोज कराया और मुंहमांगी दक्षिणा दी । तो ये कार्य देख के उनकी पत्नी जो है अंदर ही अंदर मन में कुढ़ती रही कि ये जो है इतना सारा साधु-संतों को, ब्राह्मणों को इतना रुपया-पैसा सब देते हैं, लेकिन वो बोल नहीं पाई ।
तो सर्वस्व का दान करके वो धर्म के निमेष श्रद्धा से परशुरामजी की पूजा की । इस व्रत के प्रभाव से उसकी समृद्धि बढ़ने लगी । ज्यों-ज्यों वो दान करता, त्यों-त्यों उसकी समृद्धि दुगुनी होती जाए । जो लोग ऐसा समझते है कि दान, पुण्य करने से समृद्धि घटती है, तो ऐसा नहीं है । अगर अच्छे दिन और वैसे भी तुम अगर दिल से दान, पुण्य, सत्कर्म करते हो, तो जितना तुम देते हो ना, उससे दुगुना, चार गुना आता रहता है । तो इस पुण्य के कारण राजा का दूसरा जन्म भी राजकुल में हुआ और वो राजा बना । उस जन्म में भी दान की धारा चालू रखी, तो भी उसका भंडार भरा ही रहता था । इससे इतनी सारी कीर्ति प्राप्त हुई कि मृत्युलोक में सब उसको भगवान मान के पूजा करने लगे ।
मृत्यु के बाद वो देवलोक में गया । उसकी ईर्ष्यालु पत्नी दूसरे जन्म में एक गरीब के घर पैदा हुई और जन्मभर वो बांझ होकर रही । उसको बच्चा नहीं हुआ । तो पूर्वजन्म में किए हुए अक्षय तृतीया के पुण्य से जन्म-जन्म तक उसका फल मिलता है, तो आप सभी, हम सभी इस अक्षय तृतीया के महत्व को समझे और यथाशक्ति दान, पुण्य करें । लक्ष्मी नारायण की पूजा करें और जो किसान है, जमीन का पूजन करके वंदना करें ।आज का दिन आपको अनंतकाल तक लाभदायी रहें और सुख, शांति, समृद्धि, प्रसन्नता आपके और आपके घर-परिवार में बढ़ाएँ, ऐसी मैं शुभकामनाएँ देता हूँ !
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ परशुरामाय नमः ।
ॐ गंगा माताय नमः ।
ॐ श्री कृष्णाय नमः ।
ॐ महालक्ष्मी नमः ।
ॐ अन्नपूर्णाय नमः ।
नारायण… नारायण… हरि ॐ… हरि ॐ..