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‘ध्यान बनाम विपश्यना’

‘ध्यान’ एक श्रेष्ठ अभ्यास है । ‘ध्यान’ आत्मनिरीक्षण का साधन है । ‘ध्यान’ आंतरिक शान्ति प्राप्त करने का उपाय है । ‘ध्यान’ भीतरी शक्तियाँ जागृत करने का माध्यम है ।

‘विपश्यना’ एक प्रकार से ध्यान का ही एक पर्याय है । भारत में ‘विपश्यना’ की शुरूआत भारतीय मूल के बर्मा नागरिक सत्यनारायण गोयनका ने की थी । नासिक-मुम्बई सड़क मार्ग पर इगतपुरी में ‘विपश्यना’ का मुख्यालय है । मैं वहाँ गया हूँ । काफी शांत और मनोरम्य स्थान है । गोयनका जी ने विपश्यना के विज्ञान की शिक्षा बर्मा के ध्यान विशेषज्ञ उनके गुरु सायाग्यी यम बा खिन से प्राप्त की थी ।

वास्तव में, ये विज्ञान सदियों पुराना है । कहते हैं कि लगभग ढाई हजार वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने इसका पुनरोद्धार किया था ।

‘विपश्यना’ का अभ्यास करनेवाला व्यक्ति स्वयं अपने अनुभव के आधार से देखता है । ये ऐसी टेकनीक है कि विपश्यना का अभ्यासी स्वयं को सत्य के यथार्थ स्वरूप को देखते हुए पाता है । विपश्यना से आत्मपरीक्षण की क्षमता विकसित होती है ।

4 नवम्बर, 1993 के दिन विपश्यना संस्था ने दिल्ली के तिहाड़ जेल में कैदियों के मानसिक परिवर्तन हेतु ध्यान संबंधित एक विशेष पद्धति द्वारा अपनी विशेष सेवाएँ अर्पण करने का प्रस्ताव रखा था जिसे स्वीकार किया गया और विपश्यना के द्वारा कैदियों में अभूतपूर्व आश्चर्यजनक परिवर्तन देखे गये जिसका जिक्र किरण बेदी ने अपनी पुस्तकों में किया है । ‘इट्स ऑलवेज पॉसिबल’ नामक पुस्तक में किरण बेदी ने तिहाड़ जेल में किए सुधार, विपश्यना के प्रयोग का वर्णन है । इस पुस्तक का हिन्दी, गुजराती, मराठी व इटालियन भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है ।

बड़ौदा जेल के सुप्रीडेन्ट श्री रघुवीर वोरा ने भी वडोदरा जेल के कैदियों को विपश्यना के जरिये मानसिक परिवर्तन के सफल प्रयोग किये थे ।

विपश्यना के द्वारा अपने मस्तिष्क को अंकुश में रखने की क्षमता विकसित होती है । बाह्य जगत के साथ अधिक अच्छे तरीके से व्यवहार कुशल बनने में विपश्यना सहायक सिद्ध होती है । चित्त की निर्मलता और आनंदमय जीवन का विपश्यना मार्ग प्रशस्त करती है । कष्टों में से मुक्ति प्राप्त करने का रास्ता सरल हो जाता है । अवसाद, तनाव, चिंता, भय आदि मानसिक रोगों से व्यक्ति मुक्त हो जाता है । ध्यान, विपश्यना के द्वारा व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही बदल जाता है । इससे मौन रहने का अभ्यास बढ़ता है, अंतर्मुखता विकसित होती है ।

जब किरण बेदी को पूछा गया कि विपश्यना का कैदियों पर कैसा असर रहा तब उन्होंने कहा कि “लगभग सौ कैदियों और जेल कर्मचारियों में इस अभ्यास के जरिये 95% परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया । अधिकतर लोगों के शराब व धूम्रपान छूट गये । विपश्यना करनेवालों के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन पाया गया ।”

विपश्यना कोई धर्म नहीं है । प्रत्येक धर्म के लोग इसे कर सकते हैं । ये अपने मस्तिष्क को पहचानने की प्रणाली है । यह मानसिक शस्त्र प्रक्रिया है । आप इसे आजमा सकते हैं । मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक जेल में इसे निश्चित अनिवार्य रूप से लागू किया जाए । ये तो सभी के लिए लाभदायी है चाहे वो जेल के अंदर हो या बाहर हो ।

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