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“नारायण साँई का वैश्विक सार्वजनिक पत्र”

देश-विदेश में रहनेवाले मेरे प्यारे भाईयों-बहनों ! साधक-भक्तजनों ! आपके समक्ष सूरत की जेल से मैं, नारायण साँई शब्ददेह बनकर बहुत समय के बाद उपस्थित हुआ हूँ ।

कई दिनों से आपको पत्र लिखने का सोच रहा था । काफी कशमकश के बाद, आखिर आज आपके लिए विशेष रूप से कलम को उठा ही लिया है और हृदय की बात आप तक पहुँचाने के उफान को रोक पाना अब मुश्किल-सा हुआ, सो आपके पास हूँ । वैसे, ‘मेरी कलम से… आपके लिए’ जो भी जेल की इन ऊँची दीवारों के भीतर से लिखता रहता हूँ…, वह किसी न किसी तरह आप तक पहुँचता ही होगा… ‘विश्वगुरु ओजस्वी’ मासिक पत्रिका के माध्यम से या ई-मैगज़ीन के जरिये या फेसबुक, ट्वीटर के जरिये या फिर जो व्हाट्सअप ग्रुप में जो जुड़े हैं, वे भी अपने मोबाइल में मेरे संदेश, विचार पढ़ते हैं, काफी प्रसन्न होते है, इसकी जानकारी आती है मेरे पास । श्रेष्ठ विचार अनेकानेक लोगों तक पहुँचाने की जो सेवा करते हैं, मैं उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ । एक अच्छा विचार, कब-किसके जीवन में कर्म के रूप में घटित हो जाए और एक अच्छा कर्म, फिर कब किसी को अच्छे जीवन के लिए प्रेरित कर दे, कहना मुश्किल है लेकिन अच्छे विचार व कर्म करने का, फैलाने का सिलसिला जारी रहना चाहिये । मैं जानता हूँ, मेरे संदेश को पढ़कर आपको प्रसन्नता होती है और मेरे पत्र की आप बेसब्री से प्रतिक्षा भी करते हैं । शायद आपकी यही प्रतिक्षा मुझे बार-बार आपको पत्र लिखने के लिए उत्साहित करती है ।

तो, शुरुआत करता हूँ, आपका कुशल मंगल पूछ रहा हूँ – कैसे हैं आप ? ठीक तो हैं ? कुशल तो हैं ? आपके पत्र भी मेरे पास पहुँचते है । मुझे मुम्बई में रहनेवाले नन्दलाल चौऋषि जी का पत्र मिला, वे खारघर में रहते हैं । उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी लिखा है परन्तु मोबाइल पर इस जेल में प्रतिबंध है इसलिए मैं उनसे बात नहीं कर पाया । परंतु आप मेरा संदेश उन तक पहुँचा देना कि उनका पत्र मुझे मिला है और मैंने पढ़ा है । उनका नंबर है – 9969255937 ।

आज दो कार्ड और मिले हैं जिसमें श्री आद्यशक्ति जगदंबा महामंडल, समस्त जोशीपुरा के ग्रामजनों ने आमंत्रण भेजा है । यह विरमगाम तहसील, जिला – अहमदाबाद में है । श्री आद्यशक्ति जगदंबा मंदिर में सुवर्ण जयंती के उपलक्ष्य में नवचंडी यज्ञ हुआ । 3/5/2018, गुरुवार को उसमें उपस्थित रहने का आमंत्रण है । सभी को इस आयोजन की बधाई ! एक अन्य कार्ड मिला है जो धुलिया (महाराष्ट्र) में वैवाहिक समारोह में 7/5/2018 को आमंत्रित किया है मुझे । भामरे परिवार को इस शुभ अवसर पर बधाई देता हूँ और युगल को आशीर्वाद देता हूँ । उम्मीद करता हूँ यह संदेश उन तक भी पहुँचेगा । नवदंपत्ति, दिपाली और विपीन को शुभमंगल विवाह की शुभकामनाएं ! बधाई ! ‘ओजस्वी अध्यात्म’ पुस्तक पढ़ना और वेदान्तिक जीवनशैली को अपनाना । मैं विश्वास देता हूँ कि यह प्रयोग आपकी जिंदगी में सुख-शांति की वृद्धि करेगा और उन्नति में अवश्य ही महत्वपूर्ण होगा । पुस्तक छप गई होगी, मंगवा लेना या फिर www.ohmmo.org/blog से ‘ओजस्वी अध्यात्म’ e-book डाउनलोड कर लेना और प्रतिदिन इसका पठन करना ।

दिल्ली से, आदर्श पंचायतीराज पत्रिका भी मुझे मिलती रहती है और अभी मुम्बई से संस्कार निर्माण अखबार भी शुरू हुआ है । श्री सरावगी व उनके साथियों को इसके सफल प्रकाशन पर बधाई देता हूँ । पत्रकारिता निर्भीक होनी चाहिये । दबावमुक्त । खतरामुक्त । निष्पक्ष और सच को उजागर करने में भय से रहित । आज मीडिया ही सवालों के घेरे में है और उसके प्रति विश्वसनीयता घटती जा रही है, ये अच्छी बात नहीं है । हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है । यह दिन 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित है । दुःख के साथ यह स्वीकार करना होगा कि प्रेस/मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में भारत की स्थिति 138 वें पायदान पर है । रिपोर्ट्स विदाउट बोर्डर्स की रिपोर्ट में नोर्वे इस मामले में पहले नम्बर पर है । चिंताजनक बात है कि कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि 1992 से अब तक 40 पत्रकार मारे गये हैं और उनमें से 27 केसों में किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है । ये बात विचलित करनेवाली है । सच कहें तो, समूची दुनिया में आज मीडिया की आजादी को खतरा बना हुआ है । लिखने और बोलने की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है । भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है ऐसी स्थिति में भारत का यह कर्तव्य बनता है कि वह प्रेस की आजादी को सुरक्षित और संरक्षित करने का उदाहरण पूरी दुनिया में पेश करे ।

मुझे जानकारी मिली है कि इंटरनेट के जरिये झूठी और मनगढ़ंत खबरें तेजी से प्रसारित की जाने लगी है । कभी-कभी दंगे भड़काने की कोशिशें होती हैं । ये केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में इस तरह की कोशिशें हो रही है ये अच्छी बात नहीं है, इसे रोकना होगा । पत्रकार बिरादरी को ऐसे हालातों से सतर्क रहने की जरूरत है । यह भी समझना होगा कि गलत खबरों को प्रसारित करने के पीछे कौन लोग हैं ? गलत खबरों के लिए मीडिया से जुड़े लोगों को खुद के इस्तेमाल होने से भी रोकना होगा । हमें खबरों को सही तथ्यों के साथ दिखाने का कर्तव्य पूरा करते रहना होगा ।

मैं चाहता हूँ कि पत्रकार बिरादरी के लोगों के साथ अगर कुछ गलत होता है तो सभी मिलकर उसका विरोध करें, अहिंसक रूप से निर्भीकता के साथ खबरों में संतुलन बनाये रखें । यदि किसी अफसर, राजनेता या किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के ऊपर कोई भी आरोप है तो उसके विरुद्ध एकतरफा खबर पेश न की जाए । जो भी आरोपित है, उसका मंतव्य, उसका दृष्टिकोण भी लोगों के सामने पक्षपातरहित होकर पेश करना चाहिये ।

जो भी दल सत्ता में आता है वह अपने विरुद्ध खबरों के प्रकाशन-प्रसारण को रोकने की हर संभव कोशिश करता है । कभी विज्ञापनों का प्रलोभन होता है तो कभी विज्ञापनों को रोकने की धमकी दी जाती है । कभी विज्ञापन सीमित कर दिये जाते हैं तो कभी बिल्कुल ही बंद कर दिये जाते हैं । किसी न किसी तरह से मीडिया पर दबाव बनाने की कोशिश होती ही रहती है । इतना ही नहीं, कहीं-कहीं तो कानून का दुरुपयोग करके मान-हानि के, देश द्रोह के केस (मुकदमें) भी कर दिये जाते हैं । हालात तो ऐसे हैं कि पत्रकारों को जेल तक में डाल दिया जाता है । गौरी लंकेश जैसे पत्रकार को सच लिखने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी । ऐसा करनेवालों को धमकाने का दौर शुरू हो जाता है ।

हमारे देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सबको बोलने व लिखने की आजादी है और मीडिया का काम यही है कि सरकारी या गैर-सरकारी स्तर पर भी यदि कुछ गलत हो रहा है तो उसे आईना दिखाए । लेकिन आज के दौर में तो पत्रकारों की आवाज दबाई जा रही है । स्वतंत्र रूप से प्रेस को, मीडिया को काम करने नहीं दिया जा रहा है । यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरा है । मैं आशा करता हूँ कि मीडिया अपनी शक्ति को पहचाने, अपने अधिकारों को जाने और इसका हनन न होने दे । राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक श्री गुलाब कोठारी को धन्यवाद देता हूँ कि जिन्होंने ‘जबतक काला तबतक ताला’ अभियान छेड़ दिया और उसमें सफलता प्राप्त की । जिसमें जनता का हित, उसी में हमारा हित । जनता के हित के साथ सदैव मीडिया रहेगा तभी मीडिया पर जनता का भरोसा कायम रहेगा ।

बापूजी का संदेश आया था जोधपुर से, उसमें एक खास बात थी कि “बद होना बुरा है, बद – काम करना बुरा है पर बदनाम होना अच्छा है ।” बदनामी होती है तो महापुरुष खुश होते हैं । मीराबाई भी अपनी निंदा को अच्छा मानती थी । लेकिन, स्वाभाविक है कि शिष्यों को, भक्तों को अपने गुरु की, स्वामी की निंदा से कितनी-कितनी तकलीफ होती है – हृदय को पीड़ा होती है वह तो गुरु की भक्ति से पावन हो चुका हृदय ही उस पीड़ा का अहसास कर सकता है । मैं मानता हूँ कि जो भी निर्णय आया है जोधपुर में, वह निर्णय दबाव में, प्रेशर में लिया गया है । पक्षपातरहित स्वतंत्र रूप से लिया गया निर्णय नहीं है । भारत का संविधान – एक परिचय, पुस्तक पढ़ रहा था पिछले दिनों, जो डॉ. दुर्गादास बसु द्वारा लिखी गई है । उसमें एक बात स्पष्ट रूप से लिखी है कि “मानवों द्वारा निर्मित न्यायिक प्रणाली पूर्णतः दोषमुक्त हो ही नहीं सकती ।” अर्थात् इस संसार में ऐसी कोई भी व्यवस्था चाहे वो सरकारी हो, गैर-सरकारी हो, अदालती हो – जहाँ-जहाँ भी वह मनुष्यों द्वारा बनाई गई, मनुष्यों द्वारा संचालित प्रक्रिया है, वहाँ-वहाँ चूक रहेगी, भूल रहेगी, गलती रहेगी और मनुष्य है जो गलती करता है, उसे सुधारता है और आगे बढ़ता है । अतः कोई भी निर्णय, कि जो मनुष्य द्वारा लिया गया हो वह पूर्ण और अंतिम नहीं होता । गैलेलियो को जेल में क्यों डाला था ? सोक्रेटिस को लोगों को भड़काने के आरोपों के तहत जेल में डाला था । भारत को आजाद कराने की कोशिश करनेवाले स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डाल दिया था । ये जेलों और कोर्टों का दुरुपयोग लंबे अरसे से होता चला आ रहा है, आज भी हो रहा है । महात्मा गांधी की पुस्तक है – ‘स्वराज ।’ उसकी प्रस्तावना में भी गाँधीजी कहते है कि “मैं न्यायालयों के परमानेंटली नाश का ध्येय नहीं रखता, चूँकि अगर ऐसा हो तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा ।” इसका मतलब यह कि महात्मा गांधी को भी कहीं न कहीं अदालतों की निरर्थकता समझ में आ गयी थी । भारत की जेलों में जिस तरह लंबे समय तक कई निर्दोषों को अपनी जिंदगी व जिंदगी का समय बर्बाद करने को मजबूर किया जाता है और वर्षों-वर्षों तक जेल में रहने के बाद उनको न्याय नहीं मिलता – यह स्थिति न्यायालयों पर से विश्वास को हिलाकर रख देती है । न्यायालयों पर सरकार के हस्तक्षेप के आरोप भी होते रहे हैं । स्थिति गंभीर है और बड़ी चिंताजनक है । इस विषय पर तो बहुत ही लंबी चर्चा दृष्टांतों के साथ हो सकती है । खैर, भारत में सबको शीघ्र न्याय मिले, सस्ता न्याय मिले और पक्षपातरहित शुद्ध बुद्धि से बिना दबाव के न्याय मिले ये मुश्किल है पर करना तो होगा ही । वरना न्यायालयों से भरोसा लोगों का खत्म होता जायेगा और यह स्थिति हानिकारक होगी । आज भी अदालतों से संतुष्टि कहाँ है लोगों में ?

आप सभी देश के जागरूक नागरिक बनें । अच्छे लोगों को मत दें । अच्छे लोगों को सत्ता में लाएं । लोकतंत्र की रक्षा करे । वाणी व अभिव्यक्ति के हमारे अधिकारों की जो रक्षा करे, प्रेस/मीडिया को स्वतंत्रता से काम करने दे, बोलने दे, ऐसे शासक, ऐसे नेता जिनमें संवेदनशीलता हो, भारत के नागरिकों की पीड़ा को, उनकी समस्याओं को समझने की जिसमें क्षमता हो और उसे मिटाने की जिसमें ताकत हो, वही नेता जीतने चाहिए, ऐसी ही सरकार को जीताना होगा । लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए विपक्ष भी मजबूत चाहिये । मजबूत विपक्ष के बिना लोकतंत्र खतरे में है । ये बात समझनी होगी ।

कभी लगता है कि कई संतों-महात्माओं को एक के बाद एक दुष्कर्म-बलात्कार के केसों में फँसाकर, उनको जेल भेजकर उनकी संपत्ति हड़प करने का एक पूर्वनियोजित षड्यंत्र ही चल रहा है । जो यह षड्यंत्र-साजिश कर रहे हैं – वे कितना ही अपना नाम छुपाना चाहें, छुप नहीं सकता । लोग जानते हैं कि राजनीतिक साजिश है । मीडिया भले इस विषय में पर्दाफाश न करे, हो सकता है प्रेस पर भी दबाव हो लेकिन भारत की जनता अब समझने लगी है । आप भी जान रहे हैं… वर्ष 2006 से अब तक की घटनाओं की समीक्षा कीजिए, मेरे बिना कहे आपको समझ में आ जायेगा ! दुःख है कि राजनीति का स्तर कितना घटिया हो गया है, कितना गिर गया है !

अंत में, सबका हो मंगल ।

भला हो सभी का ।

और आज, 102 नोट आउट फिल्म रिलीज हई है जो गुजराती लेखक सौम्य जोशी के नाटक पर से बनी है । 75 वर्ष का बेटा जिंदगी से हार जाता है जबकि 102 साल की उम्र में पहुँचा बाप जिंदादिल है । चूँकि मेरे पास टी.वी नहीं, और मैंने यह फिल्म देखी भी नहीं । खास बात ये है कि हमारी जिंदादिली बनी रहनी चाहिए, चाहे कितनी ही उम्र बड़ी क्यों न हो जाए ! आशा, उमंग, उत्साह बरकरार रहे ! इस फिल्म में ये खास बात प्रेरक है ।

रशियन मॉडल इरीना शायक अब माँ बन गई है और मातृसुख का आनंद लेगी । हॉलीवुड की अभिनेत्री ब्रान्डी ग्लेनविल अपने ट्वीटर अकाउंट पर सक्रिय रहते हुए विवादों में भी रहती हैं पर बदनामी से डरती नहीं । स्वयं को जैसे है वैसे ही रखने की सहजता है उनमें । अनावरण सहज बन गया है उसके लिए । लोगों की परवाह नहीं कि कौन क्या कहेगा !

पत्र को पूर्ण करने से पहले, एक बात और – मोबाइल फोन के इस युग में घड़ी के छठवें भाग में दुनिया के किसी भी कोने में संदेश भेजा जा सकता है परंतु किसी कारण से नेटवर्क न हो तो क्या होगा ? कभी भारी वर्षा, आँधी-तूफान या भूकंप या फिर प्राकृतिक आपदा, सुनामी आदि के दौरान लैंडलाइन टेलीफोन सेवाएँ भी ठप्प हो जाती हैं तब कैसी दशा होती है ? इन सारी संभावनाओं को देखते हुए ही भारत के उड़ीसा राज्य की पुलिस ने ई-कम्युनिकेशन के युग में भी संदेश-व्यवहार के लिए कबूतरों का उपयोग चालू रखा है । जैसे कि सैंकड़ों-हजारों साल पहले भारत में संदेश लेने-देने के लिए कबूतरों का उपयोग होता था । मुगल शासन के दौरान ट्रेनिंग देकर कबूतरों को तैयार किया जाता था । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी उड़ीसा पुलिस कागज के छोटे से टुकड़े में संदेश (मैसेज) लिखकर उसे प्लास्टिक की छोटी-सी कैप्सूल में डालकर कबूतर के पैरों में बाँध देती है और कबूतर को उड़ाकर निर्धारित स्थान तक पहुँचा देती है । उड़ीसा के कोरापुट जिले के पहाड़ी क्षेत्र के लिए यह सेवा शुरू की गई है । ये योजना सफल हुई है इसलिए 700 कबूतरों को प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) देकर तैयार किया गया है ।

और एक बात कि जैसे भारत की केन्द्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया है उसी तरह इंग्लैंड में बैंक ऑफ इंग्लैंड है । अगले साल वहाँ नए गवर्नर की नियुक्ति होनी है । इसके लिए जिन अर्थशास्त्रियों के नाम की विचारणा चल रही है उसमें रघुराम राजन के नाम की भी चर्चा है जो भारत के RBI के भूतपूर्व गवर्नर थे जो आजकल यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो बूथ के प्रोफेसर हैं । भारतीय मूल की छात्रा (18 वर्षीय) विजया कुमार रागवी को जेनेटिक हार्ट डिजिस में रिसर्च के लिए ‘ए स्टार टेलेंट सर्च अवॉर्ड’ दिया गया है ।

भारत का विश्व में नाम बढ़ रहा है, प्रभाव बढ़ रहा है लेकिन, भारत में कई धर्मगुरुओं को पूर्वनियोजित साजिश के तहत जेलों में डालने का और धर्मस्थानों की संपत्ति को हथियाने का प्रयास भी हो रहा है । ये गलत है और जागरूक जनता, आप सभी अपने धर्मस्थानों को बचाने के यथासंभव प्रयास करें । ‘यतो धर्मस्ततो जयः ।’ संकट के दौर से गुजर रहे हैं हम लोग, फिर भी ये आत्मसात् तो करना ही होगा कि –

“गमों के पहाड़ आएं भी तो,

हरदम मुस्कुराना सीखें हम ।

काले दाग बुरे वक्त के जो

हिम्मत से उनको मिटाना, सीखें हम । ।”

धर्म रक्षा करें हम ।

भारत को विश्वगुरु बनाने आसुरी तत्वों से डटकर मुकाबला करें हम । ।

संस्कृति को मिटाने की

साजिशों को समझें हम ।

अवसरवादियों से सावधानी बरतें हम । ।

अपने ऊँचे लक्ष्य पर

सदा नजर रखें हम ।

अपनी श्रद्धा को अखंड बनाए रखें हम । ।

अपने विश्वास को अडिग बनाएं रखें हम ।

राजनीति को धर्म से अलग रखें हम । ।

एकता-अखंडता को बनाएं रखें हम ।

ओजस्वी अभिनव भारत का निर्माण करें हम । ।

मायूसी सारी छोड़कर आशा बनाए रखें हम ।

हौंसलों को बुलंद रख हिम्मत से आगे बढ़ें हम । ।

 

(कुछ समय बाद फिर से मिलूँगा इसी तरह या किसी तरह । अक्षरदेह बनकर । सारी सीमाएँ लाँघकर, जेल की दीवारों को फांदकर आ जाऊँगा आपके समक्ष मैं, किसी तरह -, चाहे आप होंगे कितने ही दूर । अगर आप चाहें मेरे पत्र का उत्तर देना, अवश्य भेज सकते हैं इस पते पर – नारायण साँई, लाजपोर जेल, सचिन, सूरत, गुजरात । पिनकोड – 394235

 

आपका अपना –

सुहृदय हितैषी, नारायण साँई

4 मई, 2018

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