संगीत जीवन की ध्वनि है !
(विश्व संगीत दिवस – 21 जून)
– पूज्य श्री नारायण साँईं
सूरों के अनेक ताल हैं और हरेक ताल का भी एक लय है । संगीत की दुनिया में हमने अनेक सुर सुने होंगे और गाये होंगे लेकिन क्या आप जानते हो कि संगीत के कितने प्रकार हैं ?
सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि से उत्पन्न होता है, वह संगीत कहलाता है । संगीत के मोहन-सुर की मादकता का जीव जगत पर जो प्रभाव पड़ता है, वह किसीसे छुपा नहीं है । संगीत हमारे जीवन में आन्तरिक और आवश्यक भूमिका निभाता है । संगीत विभिन्न प्रकार का होता है, जिनका हम अपनी आवश्यकता और जरूरत के अनुसार आनंद ले सकते हैं ।
संगीत के विभिन्न प्रकार
भारतीय संगीत में संगीत के मुख्यतः दो प्रकार माने गए हैं – शास्त्रीय संगीत, भाव संगीत ।
शास्त्रीय संगीत
आसान भाषा में शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं, जिसमें नियमित शास्त्र होता, जिसमें कुछ विशेष नियमों क पालन करना आवश्यक होता है । उदाहरण के लिए हमें शास्त्रीय संगीत के रागों में कुछ विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है । राग के नियमों का पालन न करने से राग हानि होती है । हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी 2 पद्धतियाँ हैं – उत्तरी (हिन्दुस्तानी) संगीत, दक्षिणी (कर्नाटक) संगीत ।
उत्तरी (हिंदुस्तानी) संगीत – उत्तरी संगीत को हिंदुस्तानी संगीत भी कहते हैं, यह पद्धति उत्तरी हिंदुस्तान में – बंगाल, बिहार, उड़ीसा, पंजाब, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू, कश्मीर इत्यादि प्रांतो में गायी बजायी जाती है ।
दक्षिणी (कर्नाटक) संगीत – दक्षिणी संगीत पद्धति को कर्नाटक संगीत पद्धति के नाम से भी जानते हैं । यह पद्धति – तमिलनाडु, तैमूर, आंध्रप्रदेश दक्षिण के अन्य राज्यों में प्रचलित है । ये दोनों पद्धतियाँ अलग होते हुये भी इनमें बहुत कुछ समानता है ।
भाव संगीत
भाव संगीत को लाइट म्यूजिक भी कहते हैं । भाव संगीत में शास्त्रीय संगीत के समान न कोई बंधन होता है और न ही नियमित शास्त्र होता है । भाव संगीत का मात्र एक उद्देश्य होता है कानों को अच्छा लगना । अतः इसमें कोई बंधन नहीं होता । हम चाहे जिस स्वर का प्रयोग करें, जिस ताल, जिस लय में गाएँ, जब अलाप तान लें, बस कानों को सुनने में अच्छा लगे । भाव संगीत की रंजकता (मधुरता) बढ़ाने के लिए कभी-कभी शास्त्रीय संगीत का सहारा लिया जाता है । भाव संगीत को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है – चित्रपट संगीत, लोक संगीत, भजन – गीत आदि ।
चित्रपट संगीत – फिल्मों में जो गाने प्रयोग किये जाते हैं, उसे हम चित्रपट संगीत कहते हैं । झनक झनक मोरी बाजे पायलिया पूर्णतः शास्त्रीय शैली होते हुए भी इसे हम चित्रपट संगीत में गिनते हैं, क्योंकि इनका प्रयोग फिल्म में किया गया है । साधारण फिल्मों के गीतों की कुछ निजी विशेषता होती है, जैसे उसमें तरह-तरह के वाद्यों का प्रयोग होता है, ध्वनि रिकॉर्ड करने से पहले उसको सजाया जाता है । इन्हीं कारणों से साधारण जनता फिल्मी गीतों को सुनना ज्यादा पसंद करती है ।
लोक गीत – यह मुख्यतः क्षेत्रीय या ग्रामीणों का गीत है । इन गीतों में सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे रीति-रिवाजों की झलक मिलती है । इसके अंतर्गत शादी व विभिन्न संस्कारों में गाये जानेबाले गीत हैं । अधिकतर लोक गीत के साथ ढोलक बजाया जाता है । इनके कुछ नाम हैं – चैती, कजरी, दादरा, इत्यादि ।
भजन गीत आदि – जिन गीतों में ईश्वर का गुणगान या प्रार्थना की जाती है, उसे हम भजन कहते हैं । जिन कविताओं को स्वरबद्ध तरीके से गया जाता है, उनको गीत कहते हैं । इन गीतों में भी कोई बंधन नहीं होता, अधिकतर ये दादरा कहरवा ताल में होते हैं ।
गीत-संगीत से होता है कई बीमारियों का इलाज
अब सिर्फ दवाइयों से ही नहीं, बल्कि अपरंपरागत उपचार विधियों से भी किया जाने लगा है बीमारियों का इलाज । सुगंध, स्पर्श से लेकर संगीत द्वारा भी बहुत-सी बीमारियों का इलाज किया जाने लगा है । बहुत से शोधों के उपरांत चिकित्सा विज्ञान भी यह मानने लगा है कि प्रतिदिन 20 मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनने से रोजमर्रा की होनेवाली बहुत-सी बीमारियों से निजात पाई जा सकती है । हाल ही में खबर आई है कि कई दिनों से कोमा में पड़ा एक बच्चा अपनी माँ की लोरी सुनकर होश में आ गया । यह सिद्ध करता है कि ध्वनि तरंगों के माध्यम से भी उपचार किया जा सकता है ।
विशेषज्ञों की मानें तो संगीत अपने आप में बहुत प्रभावी है और तनाव तथा कई मानसिक रोगों से निजात दिलाने में तथा तन और मन को प्रसन्न रखने में अहम भूमिका निभाता है । ‘हीलिंग हैंडफ में ‘काउंसेलर एंड एडवाइजरफ डॉ. सतीश कपूर का कहना है कि संगीत का प्रभाव बहुत गहरा होता है । यह नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदल सकता है और ‘म्यूजिक थेरेपीफ यानी ‘संगीत थेरेपीफ का आधार भी यही है । संगीत की स्वर लहरियों से मनोरंजन के तौर पर तो मन प्रसन्न होता है । साथ ही यह तनाव और कई मानसिक विकारों को दूर करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । म्यूजिक थेरेपी से महिलाओं को काफी फायदा होता है क्योंकि उनको घर के साथ कार्यालय की जिम्मेदारी भी संभालनी होती है । काम का बोझ बढ़ता है, तो उन पर तनाव हावी हो जाता है । ऐसे में म्यूजिक थेरेपी उनके लिए कारगर साबित हो सकती है ।
गंधर्व-वेद जो उपवेद भी कहलाता है, संगीत पर आधारित है । इसमें भी रोगियों के उपचार के लिए संगीत का उपयोग किए जाने का उल्लेख है । प्राचीन शास्त्रों के अनुसार यदि किसी जातक को किसी ग्रह विशेष से संबंधित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबंधित राग, सुर अथवा गीत सुनाए जाएँ तो जातक विशेष जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है । आइए जानते हैं ऐसे बहुत से रोग व उनसे राहत देने वाले गीत-संगीत और रागों के विषय में…निम्न शास्त्रीय रागों का उल्लेख किया गया है । इन रागों में कोई भी गीत, संगीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।
1) हृदयरोग : इस रोग में राग दरबारी व राग सारंग से संबंधित संगीत सुनना लाभदायक है । मध्यम सितार वादन से फायदा होता है, तेज संगीत न सुनें ।
2) अनिद्रा : यह रोग हमारे जीवन में होनेवाले सबसे साधारण रोगों में से एक है । इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है । बिस्तर पर शांतचित्त होकर मध्यम बांसुरी वादन सुनने से फायदा होता है ।
3) पित्त रोग : इस रोग के होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता है । खाना खाते समय विशेषकर पानी-हवा जैसी प्राकृतिक ध्वनियों से परिपूर्ण मध्यम स्वर लहरियाँ सुनने से फायदा होता है ।
4) कमजोरी : यह रोग शारीरिक शक्तिहीनता से संबंधित है । इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ भी काम कर पाने में खुद को असमर्थ महसूस करता है । इस रोग के होने पर राग जयवंती सुनना या गाना लाभदायक होता है । उत्साह का संचार करने के लिए थोड़ा तेज संगीत सुनें ।
5) याद्दाश्त : जिन लोगों की याद्दाश्त कम हो या कम हो रही हो, उन्हें राग शिवरंजनी सुनने से बहुत लाभ मिलता है । वीणा वादन और बांसुरी सुनने से अत्यधिक फायदा होता है ।
6) खून की कमी या शारीरिक कमजोरी से पीड़ित होने पर व्यक्ति निस्तेज रहता है । राग पीलू से संबंधित गीत सुनने से लाभ पाया जा सकता है । मृदंग और ढोलक से उत्साह का संचार होता है ।
7) मनोरोग अथवा डिप्रेशन : इस रोग में राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक होता है । घुंघरू और तबला सुनना मन को प्रसन्न करता है ।
8) रक्तचाप : उच्च रक्तचाप में धीमी गति और निम्न रक्तचाप में तीव्र गति का गीत-संगीत लाभ देता है । वीणा वादन सुनना अति लाभदायक होता है ।
9) सांस संबधी रोग जैसे अस्थमा : इस रोग में आस्था-भक्ति पर आधारित गीत-संगीत सुनने व गाने से लाभ होता है । राग मालकौंस व राग ललित से संबंधित गीत इस रोग में सुने जा सकते हैं । प्राकृतिक स्वर लहरियाँ जैसे समुद्र की लहरें या पानी की कल-कल से अत्यंत फायदा होता है ।
भारत में संगीत की परंपरा भले ही बहुत पुरानी रही हो लेकिन संगीत से इलाज या ‘म्यूजिक थेरेपी’ की अवधारणा अभी भारतीयों में बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं है, क्योंकि इस पर बहुत खर्च आता है । संगीत थेरेपी में विकारों को दूर करने के लिए व्यक्ति विशेष के स्वभाव, प्रकृति और समस्या के अनुसार संगीत तैयार करना होता है । इसके लिए ऑर्केस्ट्रा और अन्य कई उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है । जैसे-जैसे मरीज में सुधार होता है, संगीत में उसके अनुसार बदलाव किया जाता है । यही वजह है कि यह थेरेपी महंगी साबित होती है ।
देश का सबसे बड़ा संगीत गुरुकुल
पुणे में देश के सबसे बड़े संगीत गुरुकुल विश्वंशांति संगीत कला अकादमी का शुभारंभ किया गया है । इस गुरुकुल में अभावों में गुमनाम हो रहीं देशभर की प्रतिभाएँ भारत रत्न लता दीदी के मार्गदर्शन में न केवल भारतीय संगीत की पारंपरिक शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि देश के सवर्श्रेष्ठ संगीत गुरुओं से शिक्षा पाकर अपने सपनों को साकार कर सकेंगे । गुरु-शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करने के साथ ही इस गुरुकुल में संगीत के छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाएगी, वहीं छात्र जितने समय तक शिक्षा लेना चाहें, ले सकेंगे ।
संगीत के सर्वश्रेष्ठ गुरू देंगे शिक्षा
संगीत की विभिन्ने विधाओं के महारथी और देश के सर्वश्रेष्ठ गुरु इस गुरुकुल में शिक्षा देंगे । बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया से लेकर पंडित डॉ. एन राजम, पंडित उल्हास काशलकर, पंडित हृदयनाथ मंगेशकर, पंडित सुरेश तलवलकर, पंडित शमा भाटे, पंडित योगेश सम्सी और पंडित देवकी जैसे गुरु महीने के छह दिन इस गुरुकुल में शिष्यों का मार्गदर्शन करेंगे । जबकि अन्य दिनों में इन गुरुओं के विश्व प्रसिद्ध शिष्य छात्रों को शिक्षित करेंगे ।
आवास और मैस का उठाना होगा खर्च
संगीत के विद्यार्थियों के लिए गुरुकुल में आवास और भोजन की भी व्ययवस्था की गई है । हालाँकि इसका खर्च छात्रों को स्वयं वहन करना होगा । जबकि शिक्षा का कोई शुल्क नहीं है । यह प्राचीन भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने के साथ ही प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को संगीत शिक्षा देने के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस अपनी तरह का पहला संस्थान है ।