अशुद्ध बुद्धि से गलत इरादे रखकर आजकल कुछ युवतियाँ या महिलाएँ पुरुषों के ऊपर गलत आरोप लगाती हैं और महिला सुरक्षा के बने हुए कानूनों का दुरुपयोग करती हैं ऐसी कई घटनाएँ सामने आ रही है । महिलाओं/युवतियों द्वारा लगाए हुए मनगढ़त गलत बेबुनियाद यौन उत्पीड़न, यौन शोषण, छेड़छाड़ के आरोपों के कारण कई पुरुष पीड़ित हुए हैं, हो रहे हैं, अपार बदनामी सिर्फ अकेले वे पुरुष ही नहीं, उनके साथ उनके परिवार वाले भी सहन करते है ।
भारत की विभिन्न जेलों में ऐसे कई पुरुष रेप के गलत आरोपों के चलते गलत सजा भुगत रहे हैं । पुरुषों के हक में देश में अब आवाज उठ रही है – पुरुष आयोग बनाने के लिए कुछ संस्थाएँ-संगठन प्रयास कर रहे हैं ऐसी बात मेरी जानकारी में आई है । करन ओबेरॉय जो कि सिंगर व एक्टर हैं – उनको भी रेप के झूठे आरोपों में एक महिला ने फँसाया और जेल भेजा ।
पूजा बेदी व कई फिल्मी सितारे उनके समर्थन में उतर आए । ाश ीेें का दुरुपयोग होने के मामले उजागर हुए । नाना पाटेकर के खिलाफ आरोप लगानेवाली महिला तनुश्री दत्ता झूठी साबित हुई । मेरा इरादा किसीको बदनाम करने का नहीं परंतु 2013 के बाद बने बलात्कार के नए कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है और बदला लेने, बदनाम करने, रुपए ऐंठने या किसी अन्य कारण से बलात्कार का आरोप किसी पुरुष पर लगाकर और उसे कलंकित करना कितना गलत है ! मैं एक ऐसा ही पीड़ित पुरुष हूँ जो यह दंश झेल रहा हूँ ।
हत्या का आरोपी 11 साल बाद रिहा
हत्या के एक आरोपी को 11 साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बरी करते हुए रिहा करने का आदेश दिया है । ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता अयूब खान के साथ-साथ सत्रह आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए सभी सत्रह आरोपियों को उम्र कैद की सजा दी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था ।
घटना मध्यप्रदेश के सीहोर के श्यामपुर की है । 1990 में 30 जनवरी की चुनावी रंजिश से जुड़ी हुई है, जिसमें इस्माइल खान नामक व्यक्ति की हत्या के आरोप में सत्रह लोगों को गिरफ्तार किया गया था ।
***
शादी के 16 साल बाद पति पर रेप का आरोप
अहमदाबाद के धांधुका पुलिस स्टेशन में एक महिला ने शादी के 16 साल बाद अपने पति पर दुष्कर्म का आरोप लगाया । महिला का आरोप था कि उसके पति ने उसके साथ साल 2001 में रेप किया था, जब वह 13 साल की थी । दोनों 16 साल से साथ रहते हैं और उनके 4 बच्चे हैं । शिकायत के बाद पुलिस ने पति को गिरफ्तार कर लिया और उसकी जमानत याचिका नामंजूर कर दी गई । पति ने पत्नी का दुष्कर्म किया था, तब वह नाबालिग थी । कोर्ट ने कहा कि इस छोटी उम्र में अगर आपसी सहमति से भी दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने हैं, तब भी अपराध गंभीर है ।
***
दिल्ली के 44 साल के एक एस्टेट एजेंट योगेश गुप्ता ने ऑफिस के एक कर्मचारी को ऑफिस के रुपयों को उठाते हुए देखा और पकड़ लिया । गुप्ता ने उस कर्मचारी को धमकी दी कि वह पुलिस में शिकायत करेगा । लेकिन गुप्ता पुलिस में जाकर शिकायत दर्ज करावे उससे पहले ही एक महिला फ्लैट खरीदने के बहाने गुप्ता की ऑफिस में आई । ऑफिस के एक कर्मचारी के साथ एक फ्लैट भी देखा । ऑफिस में वापस आने के बाद उस महिला ने योगेश गुप्ता को रिक्वेस्ट की कि – ‘मुझे आपकी कार में नजदीक के मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आइये ।’ एक संभवित ग्राहक की रिक्वेस्ट को मान देते हुए गुप्ता उसकी रिक्वेस्ट को ठुकरा नहीं सके । गुप्ताजी उस महिला को स्टेशन पर अपनी कार में छोड़कर आये । उसके बाद उस महिला ने पुलिस में जाकर शिकायत (ऋ.ख.ठ.) दर्ज की कि गुप्ता मुझे एक बिल्डिंग के चौथी मंजिल पर ले गया जो खाली फ्लैट था, उसमें मेरे साथ बलात्कार किया ।
उस महिला को किसी बिल्डिंग के चौथे मंजिले पर ले जाना और वहाँ उस पर बलात्कार करना और वहाँ से मेट्रो स्टेशन पर छोड़ने जाना और स्टेशन से ऑफिस वापस आना इस प्रक्रिया में कम से कम 37 से 40 मिनट तो लगेंगे ही ।
गुप्ताजी की किस्मत अच्छी थी कि ऑफिस में उउढत कैमरे फिट किये हुए थे । वे इसे साबित करने की स्थिति में थे कि वे केवल 11 मिनट में ऑफिस वापस आ गये थे । उनको पक्का विश्वास था कि वे बलात्कारी नहीं हैं और ये सिद्ध करने के लिए उनके पास पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन गुप्ताजी एक ऐसे कानूनी जाल में फँस गये थे, जो व्यवस्था उनको निर्दोष नहीं, लेकिन रेपिस्ट सिद्ध करने के लिए आमादा (पर्याप्त) थी, मजबूर थी । अन्यथा गुप्ताजी के सबूत प्रथम दृष्टया ही ध्यान में लेने की जरूरत थी ।
योगेश गुप्ता कहते हैं कि मुझे जो कहना था वो सुनने के लिए कोई तैयार ही नहीं था । पुलिस मेरे साथ बात ही नहीं करती थी । मैंने कई कोशिशें की लेकिन उसके बाद के आठ महीने मुझे न्याय ही नहीं मिला । पुलिस की जाँच जब तक चली तब तक उनको एक बलात्कारी के रूप में सामाजिक भर्त्सना सहन करनी पड़ी ।
बीबीसी लंदन के समक्ष उन्होंने अपनी आपबीती का वर्णन करते हुए कहा कि मेरी पत्नी, बच्चे, मेरे भाई और मेरे पिता जिस मानसिक यातना से गुजरे, उसका वर्णन करना कठिन है । मेरे बच्चे बहुत बुरे समय में से गुजरे । मेरी 6 साल की बेटी भगवान को पत्र लिखने लगी कि मेरे पिताजी को इस यातना से मुक्त करो । मेरे केस की जब अदालत में सुनवाई हुई तब आरोप लगानेवाली महिला ने अदालत में कबूल किया कि उसने एकदम झूठा आरोप लगाया था । लेकिन उससे पहले तो असहनीय नुकसान हो चुका था ।
***
फास्ट ट्रेक कोर्ट, दिल्ली की न्यायाधीश श्रीमती निवेदिता शर्मा ने कहा – इन दिनों बलात्कार या यौन शोषण के झूठे मुकदमे दर्ज कराने का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है, जो चिंताजनक है । इस तरह के चलन को रोकना बेहद जरूरी है ।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीमती कामिनी लाउ ने कहा – महिलाओं के प्रति अपराध से संबंधित कानूनों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है ।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा – कई ऐसे मामले दर्ज किये जा रहे हैं, जिनमें महिलाओं द्वारा बदला लेने के लिए तथा निजी प्रतिशोध की भावना से डरा-धमकाकर पैसों के लिए कानून को हथियार के तौर पर उपयोग किया जाता है । ऐसे मामलों के चलते बलात्कार के आँकड़े बढ़े हुए नजर आते हैं, जिससे हमारे ही समाज को नीचा देखना पड़ता है ।
पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं प्रसिद्ध एडवोकेट श्री कपिल सिब्बल ने कहा है – खझउ की धारा 376 (रेप-रोधी कानून) का दहेज उत्पीड़न से संबंधित धारा 498 की तरह ही गलत इस्तेमाल हो रहा है ।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री वीरेंद्र भट्ट ने कहा – दिल्ली में चलती बस में रेप की घटना के बाद ऐसा माहौल बन गया है कि यदि कोई महिला बयान दे देती है कि उसके साथ रेप हुआ है, तो उसे ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है और कथित आरोपी को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर दिया जाता है । इसके चलते देश में यौन-उत्पीड़न के झूठे मामलों की बाढ़-सी आ गई है, अपराध के आँकड़े बढ़ रहे हैं ।
***
डिजिटल दौर में न्यायपालिका पर दबाव
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए.के. सीकरी ने कहा कि डिजिटल दौर में न्यायपालिका दबाव में है । अपील दायर करने के साथ ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो जाती है । उन्होंने कहा कि कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से पहले ही लोग सोशल मीडिया पर यह बहस शुरू कर देते हैं कि फैसला क्या होना चाहिए और यह बात न्यायाधीशों पर प्रभाव डालती है ।
जस्टिस सीकरी लॉ एसोसिएशन एंड द पैसिफिक कॉन्फ्रेंस के दौरान डिजिटल युग में ‘प्रेस की आजादी’ विषय पर बोल रहे थे । उन्होंने कहा कि प्रेस की आजादी आज नागरिक और मानवाधिकारों को बदल रही है और मीडिया ट्रायल का मौजूदा स्वरूप इसका उदाहरण है ।
जस्टिस सीकरी ने कहा – मीडिया ट्रायल पहले भी होते थे । लेकिन, आज यह हो रहा है कि जब एक याचिका दायर की जाती है, तब कोर्ट की सुनवाई से पहले ही लोग यह बहस करने लग जाते हैं कि फैसला क्या होना चाहिए । फैसला क्या है, इस पर नहीं, बल्कि फैसला क्या होना चाहिए और मैं आपको अपने अनुभव के आधार पर यह बताना चाहूँगा कि इसका असर एक जज किस तरह से फैसला करेगा, इस पर पड़ता है । हालाँकि यह सुप्रीम कोर्ट में ज्यादा नहीं होता है । जब तक जज यहाँ तक पहुँचते हैं, वे काफी परिपक्व हो चुके होते हैं । उन्हें पता रहता है कि किस तरह से केस में फैसला लेना है, फिर चाहे मीडिया में कुछ भी हो रहा हो । आज न्याय करने पर दबाव है ।’
जस्टिस सीकरी ने कहा – ‘कुछ साल पहले यह हमेशा एक सोच रहती थी कि एक बार सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या किसी भी कोर्ट द्वारा फैसला दे दिया जाता था, तब इसकी आलोचना का पूरा अधिकार है । लेकिन, आज उस न्यायाधीश के खिलाफ भी अपमानजनक और मानहानिवाले बयान दिए जाते हैं और अभी भी इस पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहा जाता । कोर्ट की अवमानना की ताकत का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया जाता है ।’
***
प्रजातंत्र के सबसे सबल रक्षक – पुलिस
पुलिस कार्य का अर्थ है कार्य करने की सत्ता, संशोधन करने की सत्ता और सुधारने की सत्ता । पुलिस मानवाधिकार की सबसे बड़ी रक्षक भी हो सकती है और भक्षक भी ।
समाज को यह अपेक्षा रहती है कि पुलिस संवेदनशील बनकर मानवाधिकार के रक्षक की भूमिका अदा करे । मानवीय और व्यावसायिक दृष्टि से संपन्न पुलिस सेवा प्रजातंत्र के सबसे सबल रक्षकों में से है । संवेदनशीलता से युक्त पुलिस जनता की सच्ची मित्र बन सकती है और ऐसा होना भी चाहिये । मानवाधिकार की रक्षक बनकर पुलिस प्रजातंत्र का भरोसा बढ़ाये और कायम करे ऐसी हम अपेक्षा करते हैं ।
आशा है, पुलिस देशवासियों की इस अपेक्षा को पूर्ण करने का तत्परता और पूर्ण मनोयोग से प्रयास करेगी ।