न्यायिक व्यवस्था के दुरुपयोग को बिल्कुल भी सहन नहीं किया जाएगा
न्यायिक व्यवस्था के दुरुपयोग को बिल्कुल भी सहन नहीं किया जाएगा : अदालत
कई मामले न्याय के लिए नहीं बल्कि विलंब और दबाव बनाने के लिए दायर किए जाते हैं : सुप्रीम कोर्ट
निरर्थक और परेशान करने वाले मामले दर्ज करने पर दंड भी लगाया जा सकता है : सुप्रीम की टिप्पणी
| नई दिल्ली |*सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ रहे मामलों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों में दर्ज हो रहे अनेक मामले न्याय प्राप्त करने की वास्तविक इच्छा से कम और कार्यवाही में विलंब करने, विरोधियों को परेशान करने तथा न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित प्रतीत होते हैं । कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग सहन नहीं किया जाएगा । जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए जी मसीह की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है, न कि बार-बार या आधारहीन दावों को बढ़ावा देना । यदि कोई पक्ष जानबूझकर निरर्थक या परेशान करने वाले मामले दायर करता है, तो कोर्ट ऐसे मामलों को खारिज करने के साथ-साथ दंड भी लगा सकता है । पीठ ने स्पष्ट किया कि एक बार जब कोई मामला सक्षम अदालत में पूरी तरह सुना जा चुका हो और निर्णय हो चुका हो, तब उसी मुद्दे को फिर से उठाना न्यायिक व्यवस्था के विरुद्ध है ।
पेंडिंग मामलों की बड़ी संख्या :
उल्लेखनीय है कि देशभर में लगभग 5.5 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें अधिकांश मामले निचली अदालतों में हैं । सर्वोच्च अदालत में 10 वर्ष से अधिक समय से 698 से अधिक जनहित याचिकाएं लंबित हैं । जबकि कुल 3500 जनहित याचिकाएं आज तक सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं, जिनका पिछले 42 वर्षों में भी निपटारा नहीं हो सका है । *संपत्ति विवाद पर सुनवाई में कोर्ट की टिप्पणी* सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी एक सिविल अपील को खारिज करते समय आई थी । मामला हैदराबाद के हिमायत नगर में स्थित एक संपत्ति विवाद से संबंधित था । सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा, हालांकि उसके कुछ तर्कों से असहमति भी व्यक्त की ।