ब्रह्मलीन मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी के महानिर्वाण दिवस पर “अम्माजी” के कुछ अनसुने प्रसंग…
गुरुवचन माने एक व्रत, एक नियम
पूजनीया मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी (अम्मा) गुरुभक्ति व गुरुनिष्ठा के महान इतिहास का एक प्रेरणादायी स्वर्णिम अध्याय हैं । पूज्य बापूजी में उनकी निष्ठा और गुरु आज्ञापालन का भाव अद्भुत था ।
एक बार कुंभ मेले के अवसर पर पूज्य बापूजी हरिद्वार में रुके हुए थे । वहाँ उन्होंने अम्मा को भी कुछ दिनों के लिए बुलाया था । अम्मा की शारीरिक स्थिति का ध्यान रखते हुए पूज्यश्री ने संदेश भिजवाया था कि ‘अम्मा के स्वास्थ्य के लिए प्रातःभ्रमण करना हितकारी है । परंतु अम्मा के लिए जहाँ निवास-व्यवस्था की गयी थी, वहाँ आसपास का रास्ता बहुत पथरीला था, जिससे अम्मा को सैर करने में अत्यंत कठिनाई होती थी ।
फिर भी संदेशा पाने के बाद अम्मा ने नियमित रूप से रोज सैर करना प्रारम्भ कर दिया । पूज्यश्री को जब इस बात का पता चला कि रास्ता पथरीला है, तो उन्होंने एक सेवक को अम्मा के लिए जूते की व्यवस्था करने के लिए कहा । आज्ञानुसार सेवक जूते ले गया, परंतु जूते कुछ आधुनिक ढंग के थे । जहाँ वर्तमान में जूते पहनना लोगों की दिनचर्या का एक सामान्य हिस्सा है, वहीं सीधा-सादा व परम्परागत जीवन जीनेवाली अम्मा को जूते पहनने में जरा संकोच हो रहा था । अतः वे नित्य चप्पल पहनकर ही सैर करने जाती ।
कुछ दिनों बाद बापूजी सुबह-सुबह अम्मा का स्वास्थ्य पूछने उनके निवास स्थान पर आये और अम्मा के पैरों में चप्पल देखते ही बापूजी ने उनसे जूते न पहनने का कारण पूछा ।
तब अम्मा ने बड़ी मर्यादा से कहा – “साँई ! मुझे जूते आदि की क्या जरूरत ! क्यों उन्हें लाने का कष्ट किया ! मेरा काम तो इन सादी-सूदी चप्पलों से ही चल जायेगा और दूसरा, जूते पहनना मुझे दिखावटी बनने जैसा लगता है ।”
तब बापूजी ने अम्माजी को समझाया कि “इसमें दिखावटी बनने जैसी कोई बात नहीं है । चप्पल पहनने से आपके पैरों को जो कष्ट होता है, वह जूते पहनने से नहीं होगा । आप निःसंकोच जूते पहना करो ।”
इस पर अम्माजी के हृदय में बड़ी व्यथा हुई कि ‘गुरुदेव को जूते पहनने का निर्देश दो बार देने का कष्ट हुआ और मुझे समझाना भी पड़ा ।
पूरा जीवन अत्यंत सादा-सूदा, परम्परागत ढंग से बितानेवाली उन सादगीमूर्ति देवी ने लोक-लज्जा का संकोच त्यागकर गुरु-वचन को सिर-आँखों पर लगाया और ऐसी दृढ़ता के साथ जीवन में धारण किया कि उनके जीवन के अंत तक अम्मा के चरणों को स्पर्श करने का सौभाग्य चप्पलों ने हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया । तब से सभी ने अम्मा को जूते ही पहनते देखा ।
हे माँ ! हे साक्षात् श्रद्धास्वरूपिणी ! धन्य है आपकी गुरुनिष्ठा ! धन्य है आपकी अनन्य श्रद्धा ! धन्य है आपका जीवन, जिसमें पूज्य गुरुदेव का हर वचन एक व्रत, एक नियम बन जाता था !