शिकायतकर्ता की गवाही में विरोधाभास’ : सजा और आजीवन कारावास को चुनौती देने वाली याचिका में साँईं जी के वकील ने गुजरात उच्च न्यायालय को बताया…

2019 की बलात्कार की सजा और आजीवन कारावास को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर बहस करते हुए, साँईं जी की वकील ने मंगलवार (17 मार्च) को गुजरात उच्च न्यायालय को बताया कि अभियोक्त्री की गवाही में कई विरोधाभास, संशोधन और सुधार थे । हैरानी की बात है कि, इन सब पर निचली अदालत द्वारा विचार नहीं किया गया था।
वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता के पास FIR दर्ज कराने के कई अवसर थे, और यदि वास्तव में उसके साथ बलात्कार हुआ था तो उसे तत्काल FIR करनी चाहिए थी… वह 11 वर्ष तक चुप क्यों बैठी?

न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ श्री नारायण साँईं जी की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें सूरत की एक सत्र अदालत ने एक महिला के बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

शिकायतकर्ता लड़की के अनुसार, पहली बार दुष्कर्म होने के बाद वह साँईं जी के साथ टूर पर गई, अलग-अलग स्थानों पर घूमती रही और कुछ दिनों बाद वापस सूरत अपने घर लौट आई। वह अपने घर, यानी अपने कम्फ़र्ट ज़ोन में थी। इसके बाद भी उसने किसी को यह नहीं बताया कि उसके साथ ऐसा कोई कृत्य हो चुका था। इसके बावजूद जब आवेदक (साँईं जी) ने उसे दोबारा आश्रम आने के लिए कहा, तो वह तुरंत वहाँ पहुँच गई।

वकील का प्रश्न था—“क्या कोई भी महिला, जो इस तरह की यातना का शिकार हुई हो, उस व्यक्ति के एक फोन कॉल पर दोबारा उसके पास जाएगी?”
वह यह कहती है कि सूरत आश्रम में उसके साथ बलात्कार किया गया… जबकि सूरत उसका अपना घर था। वह आसानी से घर जा सकती थी, पर वह न तो घर गई और न ही उसने अपने परिवार को कुछ बताया।

शोषण के बाद भी वह अहमदाबाद से 90 किमी दूर गांभोई आश्रम में गई, जहाँ उसे संचालिका के रूप में नियुक्त किया गया। वह लगभग दो वर्षों तक वहाँ संचालिका बनी रही। फिर वह कहती है कि वहीं तीसरी बार यौन शोषण हुआ। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ भी उसने किसी को कुछ नहीं बताया। वह आश्रम की चार दीवारों में कैद नहीं थी; वह स्वयं बताती है कि उसे आश्रम के कार्यों के लिए कलेक्टर व अन्य अधिकारियों के दफ़्तरों में जाना पड़ता था। उसके पास पुलिस, परिवार—किसी को भी बताने अनेक मौके थे, फिर भी उसने FIR नहीं की।

ये सभी तथ्य साँईं जी के वकील द्वारा अदालत में प्रस्तुत किए गए।

लड़की प्रमुख घटना का उल्लेख करते हुए यह कहती है कि सूरत में उसके साथ बलात्कार हुआ। लेकिन वीडियोग्राफ़िक और डॉक्यूमेंट्री सबूत—जो FSL द्वारा सत्यापित किए गए हैं — स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि जिस समय वह घटना होने का दावा करती है, उस समय साईं जी सूरत में थे ही नहीं; वे उस समय गंगोत्री के पास थे।
इसी प्रकार, लड़की स्वयं भी उस समय सूरत में मौजूद नहीं थी, और यह तथ्य भी उपलब्ध वीडियोग्राफ़िक एवं डॉक्यूमेंट्री साक्ष्यों से सिद्ध होता है।

निचली अदालत ने इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों को कोई वेटेज नहीं दिया और अपने निर्णय में पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, जो न्यायिक प्रक्रिया में एक गंभीर त्रुटि है और इससे अत्यधिक क्षति हुई है।

साँईं जी के वकील ने उच्च न्यायालय के समक्ष आगे कहा कि अभियोक्त्री के साक्ष्यों में सच्चाई की कोई झलक नहीं थी और उसे उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली गवाह नहीं माना जा सकता। कुछ कथित इच्छुक गवाह ऐसे थे जिन्हें घटना की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं थी। वकील ने कहा कि जाँच में भी खामियाँ थीं, और यह जाँच अभियोजन पक्ष के हित में संचालित होती दिखती है।

उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ने एक भी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की। शिकायतकर्ता लड़की का कहना था कि पहले दुष्कर्म के समय आश्रम की 6 अन्य लड़कियाँ भी उसके साथ यात्रा पर थीं—फिर आश्चर्य है कि उन 6 में से किसी एक का भी बयान नहीं लिया गया।

वकील ने आगे कहा कि 2004 के बाद शिकायतकर्ता आश्रम छोड़ चुकी थी और उसे कोई सरोकार नहीं था। आश्रम छोड़ने के 5–6 महीने बाद भी, जब वह पूरी तरह सुरक्षित थी, उसने शिकायत क्यों नहीं की? 2012 और 2013 में वह साँईं जी के कार्यक्रमों में अपने पति के साथ शामिल हुई—यह स्वयं दर्शाता है कि कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था, क्योंकि “जिस महिला के साथ ऐसा कृत्य हुआ हो, वह उस व्यक्ति को सालों तक देखना भी नहीं चाहेगी, उसके साथ कार्यक्रमों में सम्मिलित होना तो बहुत दूर की बात है।”

वकील ने कहा कि समग्र स्थिति और रिकॉर्ड पर आए साक्ष्य बताते हैं कि शिकायतकर्ता एक साहसी महिला है और कोई साहसी महिला भयानक घटनाओं के बाद उस व्यक्ति के सामने स्वेच्छा से नहीं जाएगी।

विरोधाभास, सुधार, विसंगतियाँ

वकील ने कहा कि अभियोजन के अनुसार, 6 लड़कियाँ शिकायतकर्ता के साथ थीं, परंतु अभियोजन ने इन भौतिक गवाहों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया, जबकि धारा 161 CrPC के तहत उनके बयान दर्ज किए गए थे।
उन्होंने कहा कि निचली अदालत का फैसला गंभीर त्रुटियों से भरा हुआ है, अदालत ने अभियोजन गवाहों के साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन किए बिना, बचाव पक्ष के सभी तर्क एक-एक कर खारिज कर दिए। अदालत ने यह तक नहीं देखा कि क्या अभियोजन पक्ष मामला उचित संदेह से परे साबित कर पाया है।

FIR, धारा 164 CrPC के बयान और अदालत में दिए बयानों के कई संस्करणों में स्पष्ट विरोधाभास और विसंगतियाँ थीं। अदालत के समक्ष दिया गया उसका अपना साक्ष्य ही उसकी विश्वसनीयता को खंडित करता है, लेकिन निचली अदालत ने इन मुद्दों को अनदेखा कर दिया और शिकायतकर्ता की हर बात को प्रमाण मान लिया—जिससे आवेदक के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह उत्पन्न हुआ।

वकील ने एक चार्ट के माध्यम से FIR, अदालत में दिए गए बयानों और बचाव पक्ष के साक्ष्य के बीच की असंगतियों को दर्शाया।

अभियोजन का घटनाक्रम और बचाव पक्ष का प्रतिवाद

अभियोजन के अनुसार—
• दिसंबर 2001 में शिकायतकर्ता व उसके परिवार ने सूरत आश्रम के कार्यक्रम में भाग लिया।
• आवेदक ने उसे मध्य प्रदेश और फिर बिहार के दौरों पर भेजा।
• बिहार में पहले दिन शोषण का आरोप लगाया गया।
• बाद में सूरत आश्रम में अप्राकृतिक सेक्स और बलात्कार का आरोप लगाया गया।
• 2004 में आश्रम छोड़ने के बावजूद, उसने शिकायत करने का साहस नहीं किया।
• जोधपुर FIR (संत आसाराम बापू) के बाद उसने शिकायत दर्ज कराई।

वकील ने कहा:

“उसके अनुसार बिहार में पहली बार छेड़छाड़ हुई। तब उसने कोई शोर नहीं मचाया। उल्टा महीनों तक यात्रा पर जाती रही। यह किसी भी महिला के स्वाभाविक आचरण के विपरीत है। जिस व्यक्ति पर इतना बड़ा आरोप लगा रही है, उसके साथ महीनों तक कैसे घूम सकती है?”

वकील ने बताया कि पंचांग और अन्य साक्ष्यों से यह प्रमाणित है कि कथित दौरा 2002 में नहीं, 2003 में हुआ था।

भूमि-दान (गिफ़्ट डीड) के दस्तावेज़ से भी यही सिद्ध हुआ कि इसका निष्पादन 2003 में हुआ था – अभियोजन के 2002 वाले दावा का खंडन हुआ।

अपील की सुनवाई में देरी

वकील ने बताया कि न्यायिक आदेशों के बावजूद अपील की सुनवाई नहीं हो सकी, यह किसी की गलती नहीं बल्कि अदालतों में लंबित अपीलों के कारण है। उन्होंने यह भी कहा कि छह वर्ष तक अपील पर सुनवाई न होना अनुचित है, जबकि बचाव पक्ष ने केवल एक बार समय माँगा था।

आवेदक ने उच्च न्यायालय के दो आदेशों (11-08-2021 और 20-06-2025) के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित करते हुए कहा कि आवेदक को नया जमानत आवेदन दायर करने की स्वतंत्रता दी जाती है और उच्च न्यायालय से इसे शीघ्रता से तय करने को कहा जाता है।

केस का शीर्षक:

नारायण @ नारायण साँईं बनाम गुजरात राज्य और अन्य

 

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