पूज्य श्री साँईंजी का रामनवमी पर विशेष संदेश
पूज्य श्री साँईंजी का रामनवमी पर विशेष संदेश
यह जो रामनवमी का उत्सव है, उसमें इसके साथ-साथ पूज्य श्री मोटा एक आत्मसाक्षात्कारी जीवनमुक्त महापुरुष हो गए, उनका साक्षात्कार दिवस भी रामनवमी उत्सव के साथ मनाया जाता है । तो मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए मौन मंदिर का आदेश देनेवाले और युवाओं में साहस भावना जागृत हो, इसके लिए जिन्होंने प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान किया, ऐसे गुजरात के आत्मसाक्षात्कारी संत पूज्य श्री मोटा के आत्मसाक्षात्कार दिवस पर उनके शिष्य समर्थक व भक्तगणों द्वारा उत्सव का आयोजन किया जाता है । उसमें सूरत और गुजरात सहित देशभर से बड़ी संख्या में पूज्य श्री मोटा के अनुयायी हाजिर होते हैं ।
आओ सच्चे साधकों, साधना मिलकर करें ।
दूर हो दुःख दर्द से, प्रार्थना मिलकर करें ॥
रामनवमी के पावन अवसर पर मैं आपके साथ श्रीराम कथा के अध्येता और ‘निज मनु मुकुर सुधारी’ पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक श्री जमुना शंकर ठाकुर द्वारा रचित एक सुंदर लेख साझा करता हूँ । तो आइए, राम जन्मोत्सव की बेला में अपने भीतर के राम को जगाएँ और राम से एकाकार हो जाएँ…
हम में राम, राम में हम…
रामकथा पुरातन होते हुए भी चिरनूतन है । प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन प्रदान करना ही इसका उद्देश्य है । इसमें हम अपनी वर्तमान समस्याओं का समाधान पा सकते हैं और इस दुनिया को एक बेहतर जगह भी बना सकते हैं । रामचरितमानस में संत तुलसीदास ने राम के आदर्श जीवन को केंद्र में रखकर कथा का गान किया है । यह महज स्तुति और प्रशस्ति नहीं है, बल्कि प्रेरणा और अनुशंसा भी है कि हम राम के गुणों को आत्मसात करें ।
परिवार प्रथम
भारतीय संस्कृति परिवारों की संस्कृति हैं । तमाम स्वार्थलिप्सा और भौतिकता के बावजूद रिश्तों का सम्मान बचा है तो इसलिए कि राम अब भी भारतीयों के दिलों में बसते हैं । वचन-निर्वाह के लिए पिता ने राम के स्थान पर भरत को राज्य दिया । राम ने पिता की आज्ञा का पालन किया, लेकिन भरत राज्य पर अपने बड़े भाई का ही अधिकार मानते हैं । वन में जाकर चित्रकूट में राम से राज्य स्वीकार करने का आग्रह करते हैं । बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति उदारता और भ्रातृत्व भाव हमारे परिवारों में आज भी है ।
साहस संग धैर्य
रामराज्य पद पाते-पाते उससे वंचित हो जाते हैं । महलों की सुख-सुविधा में पलकर भी चौदह वर्ष की लंबी अवधि के लिए वनवासी जीवन बिताते हैं । वहाँ भी राक्षसों से सतत संघर्ष बना रहता है । ऐसी विकट परिस्थिति में पत्नी का अपहरण हो जाता है, लेकिन राम जीवन के प्रति हताश नहीं होते । इसके विपरीत उनका आत्म-विश्वास इतना दृढ़ है कि बस यही कहते हैं कि किसी प्रकार एक बार सीता का ठिकाना भर मालूम हो जाए, फिर तो वे काल को भी पलभर में पराजित कर सीता को छुड़ा लाएँगे ।
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं ।
कालहु जीति निमिष महुँ आनौ ॥
राम का यह अटल विश्वास हताशा व निराशा के क्षणों में पूरी मानव-जाति के लिए प्रकाश-स्तंभ है । गलाकाट प्रतिस्पर्धा, रोजाना की चुनौतियाँ, सहारे की कमी, विश्वास का अभाव, इस दौर के बड़े दुख हैं, जिनके सामने व्यक्ति खुद को बहुत छोटा और असहाय महसूस करने लगता है । ऐसे में वह या तो बुराई की धारा में बह निकलता है या फिर आत्मघाती कदम उठा लेता है । राम का जीवन ऐसी स्थिति में बहुत बड़ा संबल है । उन कमजोर क्षणों में राम को याद करना चाहिए, अपने भीतर उनका आह्वान करना चाहिए ।
सत्य के लिए संघर्ष
राम के जीवन का लक्ष्य था – एक ओर सज्जनों का परित्राण तो दूसरी ओर दुष्टों का दमन । दण्डकारण्य में अस्थियों का समूह देखकर जब उन्होंने जाना कि राक्षसों ने ऋषि-मुनियों को खा डाला है, तो उनकी आँखों में करुणा के आँसू छलक आए और उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह ।
यानी मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा । और उन्होंने ऐसा किया भी । अपने उत्साहपूर्ण साहसी संकल्प के आधार पर ही केवल वानर-भालुओं को साथ लेकर रावण जैसे दुर्धर्ष शत्रु का नाश करने में सफल होते हैं । गौर करें कि अन्याय और अत्याचार की अधिकता देखकर राम मौन नहीं हो गए । उन्होंने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा और बुराई के विरुद्ध संघर्ष किया ।
उदार नेतृत्वकर्ता
समर विजय के पश्चात् समस्त वानर-भालुओं को संबोधित करते हुए उदार-हृदय राम की वाणी इस प्रकार मुखरित हुई –
‘हे साथियों ! प्रबल शत्रु रावण तुम्हारे ही बल पर मारा गया है ।’ जीत का श्रेय संगी-साथियों को बाँटना ही कुशल नेतृत्व का गुण है । अपने सखाओं के साथ अयोध्या पहुँचने पर गुरु वशिष्ठ से भी इसी तरह परिचय कराया कि इनके सहारे ही मैंने संग्राम रूपी सागर पार किया है । दूसरों का श्रेय चुराने और आत्मप्रवंचना के इस दौर में राम और भी प्रासंगिक हो उठे हैं । वे न केवल बताते हैं, बल्कि अपने जीवन में दिखाते भी हैं कि शासक, स्वामी, बॉस, नेता को उदार, बड़े दिल का होना चाहिए ।
निर्बल के बल राम
राम का रामत्व यही है कि उनकी करुणा सदा शोषितों और समाज के पिछड़े तथा कमजोर व्यक्ति के पक्ष में प्रवाहित हुई । उन्होंने केवट, शबरी, जटायु, भील-कोल और वानर-भालुओं को भी गले लगाया । एक ओर जहाँ वे ऋषि-मुनियों के आश्रमों पर गए, वहीं शबरी की कुटिया में भी पहुँचे । शबरी से चर्चा करते हुए राम कहते हैं –
‘जाति, पाति, कुल, धर्म, बड़प्पन, धन, कुटुंब, गुण या चतुरता मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं है । मैं तो बस प्रेम चाहता हूँ ।’
जल में कमल जैसे
राम अपने भुजबल से किष्किन्धा और लंका पर विजय प्राप्त करते हैं, किंतु उन्हें अपने अधीन नहीं रखते हैं । सोने की लंका का राज्य राम विभीषण को उस स्थिति में दे देते हैं, जब वे स्वयं वनवासी हैं, फलों के भोजन पर रह रहे हैं, घास-फूस की शय्या पर शयन करते हैं । राज्यश्री के प्रति निर्लिप्त, एकदम निस्पृह । सुख-साधन जुटाने की अंधी दौड़ में आज जब बहुत कुछ पाने के बावजूद लगभग हर कोई दु:खी और अधूरा महसूस करता है, तो राम की यह निस्पृहता और भी जरूरी लगती है ।
भारतीय संस्कृति मानती है कि भक्त अंततः भगवान में समाहित हो जाता है । इसका मतलब ही यही है कि वह अपने आदर्श के गुणों का अनुकरण करता है और उन जैसा हो जाता है । यही सच्ची भक्ति है । इस रामैवनमी आईये संकल्प लें कि भगवान राम, ऐतिहासिक राजा राम, महाकाव्य के नायक राम, हम जिस रूप में भी उन्हें देखें, उनके गुणों को आत्मसात् अवश्य करें ।