मेरे पास दो ही चीज़ हैं – भजन और भोजन

मुंबई का वरली इलाका पॉश एरिया गिना जाता है । बांद्रा वरली-सी लिंक बनने के बाद यह इलाका सोने की ईंट  जैसा हो गया । पहले ऐसा नहीं था । बात 1930 के दशक की है । उस समय वरली गरीब इलाका था । समुद्र किनारे मछुआरों की थोड़ी झोपड़ियाँ और डीडी चाल के तौर पर पहचाने जाने वाले इलाके में ज़्यादातर मिल मजदूर रहते थे । ब्रिटिश राज था । इस इलाके में पीने के पानी की तकलीफ थी । तब एक चमत्कारी घटना घटी । लगभग छह फुट तीन इंच की गौरवर्णी काया वाले और पूरे शरीर पर लगाई हुई धूनी की भस्म से शोभित एक हठयोगी सिद्ध पुरुष वहाँ आए । जेब के बिना सिर्फ गले से पहनी जा सके ऐसी और घुटने तक पहुँचने वाली काली कफनी पहनी हुई थी । स्थानीय लोग उनसे गिड़गिड़ाकर बोले- बापजी, पीने के पानी की तकलीफ है । कृपा करो ।

संत ने समुद्र की रेत को देखकर एक तरफ उंगली दिखाई, इधर खोदो । लोग सोच में पड़ गए । समुद्र की रेत में मीठा पानी मिलेगा? हालाँकि दो-चार समझदार लोग तो तुरंत संत ने जहाँ उंगली दिखाई थी वहाँ खोदने लगे । समुद्र की रेत को खोदने में देर कितनी ? पाँच-छह फुट खोदा होगा कि वहाँ मीठे पानी का फव्वारा उड़ा । लोग तो हर्ष से पागल होकर नाचने लगे । संत तो चलने लगे थे पर ऐसे संकल्प सिद्ध संत को कोई वहाँ से जाने दे क्या ? बहुत समझाने और गिड़गिड़ाने के बाद संत को वहाँ रोक रखने में लोगों को सफलता मिली । संत ने वहाँ अखंड धूना जलाया । रेत का बिछौना और ईंट का तकिया करते । किसी से कुछ माँगते नहीं थे । लोग खुद-ब-खुद उनकी सेवा करने लगे । कोई दीन-दुखिया आए तो धूणीसाहेब ( यह शब्द संत ने खुद दिया है ) की चुटकी भर भभूति देते और कहते यह दवाई राम है । जाओ, अच्छा हो जाएगा ।

थोड़े दिन बीतने के बाद संत ने कहा, मेरे पास दो ही चीज़ हैं- भजन और भोजन । यहाँ आओ, भजन करो और भोजन करो । बापजी खुद बिल्कुल नन्हीं मिनी साइज की रोटी बनाते । साथ मटर ( वटाणा ) की सब्जी । जो कोई प्रणाम करने आए उसे एक रोटी और सब्जी प्रसाद रूप में देते । इस तरह बिल्कुल छोटे पैमाने पर शुरू हुआ वह भजन और भोजन का भंडारा आज पिछले सत्तर साल से चलता है । अब हर रविवार तीन सौ से चार सौ अंध-दिव्यांग और आसपास के गरीब लोग यहाँ भोजन करने आते हैं । अच्छे सुखी घरों के लोग सेवा करने आते हैं । भंडारे में परोसने की सेवा देते हैं, जूठे पत्तल उठाते हैं । राशनिंग के जमाने में भी भंडारा होता रहा । एक बार तो मुंबई के खुद मुख्य मंत्री मोरारजी देसाई जाँच करने आए कि यहाँ राशनिंग के कानून का भंग होता है? जाँच में कुछ मिला नहीं । लोग उस बात को हठयोगी संत का चमत्कार मानते हैं ।

हर बारह साल में होने वाले कुंभ मेले में बापजी ट्रेन का एक पूरा डिब्बा भरकर अनाज, घी-तेल, शक्कर-गुड़ ले जाते । जहाँ कुंभ मेला हो वहाँ रोज साधु-संतों को खिलाते । उनकी ख्याति काली कफनीवाले बाबा के तौर पर हो गई थी ।

पंजाब के धींगड़ इलाके से चलकर आए थे । वे कहते थे कि मैं जब इस तरफ आया तब बोरीबंदर और ठाणे के बीच ट्रेन भी शुरू नहीं हुई थी । उनके वतन जैसे धींगड़ में उनके नाम से उदासीन संत पूर्णदासजी एज्युकेशन सोसायटी नाम से स्कूल कॉलेज चलता है । मुंबई के वरली इलाके में विराजने के बाद उन्होंने गरीबों के लिए धर्मार्थ दवाखाना भी शुरू करवाया । शुरू में सिर्फ चार आने ( पच्चीस पैसे ) में क्वालिफाइड डॉक्टर निदान करके दवा देते थे । आज दो रुपये लेते हैं । गुजरातियों के अलावा सिंधी पंजाबी समाज में उनके अनुयायी बहुत हैं । सिंधी में रेत को वारी कहते हैं इसलिए वे वारीवारा संत के तौर पर भी पहचाने जाते हैं ।

1961 के वैशाख सुद सातम गंगा सप्तमी को 150 साल की उम्र में उन्होंने महासमाधि ली । आज उस स्थान पर उनकी समाधि का और उदासीन पंथ के संस्थापक ( गुरु नानक के पुत्र ) श्रीचंद्रबाबा का मंदिर है । आज से यहाँ तीन दिन का वरसी ( पुण्यतिथि उत्सव ) शुरू होगा । गुरुवार 23 अप्रैल को गंगा सप्तमी है । दूर अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत से प्रसिद्ध गायक कलाकार यहाँ कीर्तन सेवा देने आते हैं । तीनों दिन महाभंडारा होगा । जाति-पाति या भाषा के भेद बिना यहाँ हर किसी को प्रसाद दिया जाता है ।

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