सद्गुरु की कृपा से जिनको ज्ञान की आँख प्राप्त है, वे देखते हैं !
सद्गुरु की कृपा से जिनको ज्ञान की आँख प्राप्त है, वे देखते हैं !
(अनंत विभूषित स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के ‘आनंदरस रत्नाकर’ सत्-साहित्य से संकलित साभार)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुझ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ।।
(भगवद्गीता 15.10)
‘शरीर से निकलते हुए, शरीर में रहते हुए और गुणों से सम्बद्ध होकर भोग-भोगते हुए इसे अज्ञानी नहीं देख पाते, किन्तु जिन्हें ज्ञान-नेत्र प्राप्त हैं, वे देख पाते हैं ।
विमूढ़ लोग आत्मा के शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते हैं । वे तो उपाधि वाले स्वरूप को ही देखते हैं । तब कौन देखता है ? देखो नारायण, भगवान की खूब-खूब भक्ति करके, काम-क्रोध-लोभ को दबाकर जिसने संसार से वैराग्य सम्पादन किया है और गुरु की शरण ग्रहण करके, वेदान्तार्थ का विचार करते-करते, संशय-विपर्यय की निवृत्ति होकर और अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होकर जिसका अज्ञान निवृत्त हो गया है, वह देखता है ।
वह देखता है कि परमात्मा का कैसा खेल चल रहा है ! यह मूढ (तमोगुणी) हो जाना, विक्षिप्त (रजोगुणी) हो जाना, शांत (सत्त्वगुणी) हो जाना – यह सब तो आने-जाने वाले गुणों का खेल है, यह सारा काम उपाधि में हो रहा है और जो निरुपाधिक परमात्मा है, वह ज्यों-का-त्यों है ।
देखो न, जीव की विमूढ़ता ! जो संसार के विषयों में ही अटक गया है, विषयों को नहीं छोड़ सकता, उसको बोलते हैं – ‘मूढ’। तो विषयों में फँसकर ईश्वर को भूल जाए, इसकी परवाह श्रीकृष्ण को उतनी नहीं है । सोचते हैं कि अच्छा भाई, चलो, तुम हमको भूल गये, तो हम तुमको याद कर लेंगे । लेकिन तुम अपने आपको ही भूल गये हो, यह कितने दुःख की बात है ।
नारायण ! ये मूढ़ लोग पैसे को ही सब कुछ समझते हैं । उसके लिए मरने को तैयार । हवाई जहाज पर चढ़कर कितना खतरा उठाते हैं । चोरी करके कितना खतरा उठाते हैं । अपनी बेइज्जती का डर नहीं, पिटने का डर नहीं, जेल में जाने का डर नहीं । संसार के विषय-भोगों में इतना मग्न हो गये कि अपने आपको ही भूल गये । इसलिए इनको बोलते हैं – ‘विमूढा’।
पैसा कमाने की तो बुद्धि है, पैसे को तो समझते हैं, ठीक है, पर जिसके लिए पैसा है, जिसके लिए भोग है, उसको नहीं समझते हैं । इसलिए “नानुपश्यन्ति।”
सद्गुरु की कृपा से, निर्दोष अन्तःकरण से वेद में कहा हुआ जो ज्ञान है, वह ज्ञान जिसकी आँखें है, वह जिनको प्राप्त है, वे देखते हैं कि इस देह में स्थित हुआ भी वह देह में परिच्छिन्न नहीं है, इस देह के मरने पर भी वह नहीं मरता, इस शरीर से भोग करता हुआ भी वह भोग नहीं करता है । इसमें सुख-दुःख विक्षेप मोह आने पर भी वह उनसे युक्त नहीं होता है । पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ।