वेदों के ज्ञान और तकनीक का भान ‘जेन-जी’ को कराएंगे, तो ही विकास होगा !

वेदों के ज्ञान और तकनीक का भान ‘जेन-जी’ को कराएंगे, तो ही विकास होगा !

वेदों के ज्ञान और तकनीक का भान ‘जेन-जी’ को कराएंगे, तो ही विकास होगा !

चीन द्वारा हाल ही में अपने पूर्वी तट पर स्थित समुद्र में एक विशाल जहाज से कमर्शियल ग्रेविटी-1 नाम के रॉकेट का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण के साथ ही स्पेसरेस (अंतरिक्ष दौड़) में एक नया अध्याय जुड़ जाने के कारण वैश्विक चर्चाओं ने जन्म लिया है: चीन एक बड़ा और मजबूत देश है, लेकिन उसके पास वैश्विक नेतृत्व के लिए आवश्यक सबल पक्ष और दूरदर्शी (विज़नरी) नेतृत्व नहीं है, ऐसी चर्चा हो रही है। हकीकत में वर्तमान में भारत के पास नेतृत्व है, युवाधन है, तकनीक विकसित हुई है, लेकिन इन सभी को एक सूत्र में पिरोने वाली कोई प्रणाली (सिस्टम) नहीं है। भारत के पास सनातन ग्रंथों—वेद, उपनिषद और आरण्यक—का केवल धार्मिक उपदेश ही नहीं, बल्कि विज्ञान, खगोलशास्त्र, गणित, आयुर्वेद, भौतिकशास्त्र और धातुशास्त्र का अगाध भंडार है।

 

चीन द्वारा हाल ही में अपने पूर्वी तट पर स्थित समुद्र में एक विशाल जहाज से कमर्शियल ग्रेविटी-1 नाम के रॉकेट का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण के साथ ही स्पेसरेस में एक नया अध्याय जुड़ जाने के कारण वैश्विक चर्चाओं ने जन्म लिया है। चीन अब किसी भी स्थान से अंतरिक्ष में रॉकेट छोड़ सकता है और उपग्रह लॉन्च कर सकता है, यह इस प्रयोग द्वारा सिद्ध हुआ है।

इसके अलावा, चीन द्वारा हाल ही में अपना सूरज बनाने की दिशा में भी एक सफल परीक्षण किया गया है, जिसमें उसने अपने आर्टिफिशियल सन प्रोजेक्ट के लिए 100 टन का दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कंडक्टिंग मैग्नेट और सेंट्रल सोलेनोइड कॉइल का प्रयोग किया है। इस दौड़ में हमारा पड़ोसी देश चीन आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में विशाल कद के साथ आगे बढ़ रहा है। हालांकि, भारत और चीन की तुलना केवल फैक्ट्री उत्पादन या जीडीपी के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत के पास एक ऐसी अनूठी क्षमता है जो दुनिया के किसी अन्य देश के पास नहीं है—अनादि काल का श्रेष्ठ ज्ञान और दुनिया की सबसे युवा आबादी। भारत अगर बार-बार वैश्विक नेतृत्व हासिल करने में पीछे रह जाता है और चीन आगे बढ़ जाता है, तो इसके पीछे कारण यह है कि भारत को अपनी प्राचीन वैदिक विरासत को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर अपनी ‘जेन-जी’ (Gen-Z) को एक नई दिशा देनी होगी।

21वीं सदी तकनीक, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक प्रभाव की सदी है। आज दुनिया तेजी से बदल रही है, तब वैश्विक महासत्ता बनने की होड़ में सभी देश अपनी शक्तियों को आजमा रहे हैं। एक समय था जब पूरा विश्व ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता के लिए भारत की ओर देखता था। भारत केवल भौतिक संपत्ति से समृद्ध नहीं था, बल्कि बौद्धिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भी दुनिया का संचालन करता था। दुनिया भर से यात्री भारत का दौरा करते थे। भारत के सनातन ग्रंथों—वेद, उपनिषद, उपवेद, गणित, आयुर्वेद, भौतिकशास्त्र, धातुशास्त्र, शून्य की खोज, दशमलव प्रणाली, खगोलशास्त्र और नाट्यशास्त्र में अगाध ज्ञान था। शून्य शोध, दशमलव पद्धति, पाई का मूल्य, सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी का भारतीय ऋषियों और गणितज्ञों द्वारा आधुनिक विज्ञान के जन्म से सदियों पहले ही ज्ञान दिया गया था।

आयुर्वेद और योग आज पूरे विश्व में स्वीकार्य हो रहे हैं, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए उत्कृष्ट उपाय सिद्ध हुए हैं। भारत में युगों-युगों से इन दोनों पद्धतियों को अपनाया गया है और समाज में समाहित रही हैं। दुर्भाग्य से, समय के साथ विदेशी आक्रमणों और गुलामी के दौर के कारण हम अपनी इस विरासत को भूल गए। हमने अपनी श्रेष्ठता पर संदेह करना शुरू कर दिया। परंतु, आज समय फिर बदल चुका है। जो ज्ञान हमारे ग्रंथों में है, उसे आज का आधुनिक विज्ञान स्वीकार करने के लिए मजबूर हुआ है। भारतीय ऋषियों द्वारा दिए गए ग्रंथों और सूचनाओं को आज दुनिया में भी सराहा जा रहा है। ज्ञान की आवश्यकता है, जिसे चीन जैसे देश एआई (Artificial Intelligence), मेटावर्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों को विकसित करके दुनिया पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु, चीन की यह प्रगति केवल केंद्रीय सत्ता, भौतिकवाद और नियंत्रण पर आधारित है। इसकी तुलना में भारत के पास जो शक्ति है, वह है लोकतंत्र और स्वतंत्रता जो रचनात्मकता और नए विचारों को जन्म देती है। चीन भले ही तकनीकी प्रगति कर ले, लेकिन अगर भारत अपनी युवा शक्ति को सही दिशा दे, तो वह भारत-चीन सहित तमाम देशों को पीछे छोड़ सकता है। चीन के पास मशीनों की ताकत है, परंतु भारत के पास मशीन और मानवता दोनों का आदर्श समन्वय करने की क्षमता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि, वर्तमान में भारत के पास विश्व की सबसे युवा आबादी है। भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ‘जेन-जी’ का है। यह पीढ़ी तकनीकी रूप से अत्यधिक सक्षम है। यह पीढ़ी जन्म से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया में पली-बढ़ी है। उसमें नई तकनीक को तेजी से सीखने की क्षमता है। वह वैदिक ज्ञान से क्या हो सकता है, उससे भली-भांति परिचित है। परंतु, इस युवा पीढ़ी को यदि योग्य मार्गदर्शन न मिले, तो उसके गुमराह हो जाने की संभावना बनी रहती है। हाल ही में दिल्ली में हुए एक आयोजन में इसका उदाहरण देखने को मिला है। एक तरफ जहाँ उनकी उपलब्धियों पर सरकार ने कुछ फैसले लिए, वहीं दूसरी तरफ इस पीढ़ी ने अपने देश के विरोध में, पीएम के विरोध में और धर्म तथा देवताओं के विरोध में बीभत्स वीडियो बनाए, रील्स बनाईं। इस पीढ़ी के पास जो उत्साह है, उसे सही दिशा में मोड़ना और उसका सही उपयोग करना बहुत जरूरी है। इसलिए, भारत में ‘जेन-जी क्रांति’ का निर्माण करना समय की मांग है। इस क्रांति के हर क्षेत्र में जैसे कि तकनीक, अनुसंधान, व्यापार, शिक्षा, और कला में आगे आकर नेतृत्व करना होगा।

समझने वाली बात यह है कि, चीन का उद्देश्य केवल एक मजबूत कारखाना बनना है, जबकि भारत का उद्देश्य सच्चे अर्थों में विश्वगुरु बनना होना चाहिए। वैश्विक नेता वह नहीं है जो मात्र आर्थिक या सैन्य शक्ति से अन्य देशों को डराए, बल्कि वह है जो पूरे मानव समाज को सही रास्ता दिखाए। आज पूरा विश्व पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव और मूल्यों के क्षरण से घिरा हुआ है। भारत के पास वेदों का वह सूक्त है जो ‘पर्यावरण रक्षा’ सिखाता है, और ‘शांति पाठ’ है जो वैश्विक शांति का संदेश देता है। अगर भारत की जन-जी एक हाथ में आधुनिक लैपटॉप/तकनीक और दूसरे हाथ में उपनिषदों का ज्ञान रखकर आगे बढ़ेगी, तो दुनिया के पास भारत का अनुसरण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा।

भारत के लिए चीन या अन्य किसी देश से डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे पास इतिहास का सबसे बड़ा मानव संसाधन का भंडार है। अब आवश्यकता केवल एक स्पष्ट विजन और उसके क्रियान्वयन की है। हमें अपनी नई पीढ़ी को हीनभावना से बाहर निकालकर अपनी विरासत के प्रति जागरूक करना होगा। जब ‘जेन-जी’ पुरातन ज्ञान को पहचानेगी और उसे आधुनिक कौशल के साथ जोड़ेगी, तब भारत को ‘विश्वगुरु’ बनने से कोई रोक नहीं सकेगा। भारत की यह नई नई चेतना केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण के लिए एक नया उजाला लाएगी।

 

वेद और वेब का समन्वय करके नई पीढ़ी को तैयार करना होगा

हमें अपनी नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीक सिखाने के साथ-साथ केवल परीक्षा आधारित शिक्षा के स्थान पर व्यावहारिक शिक्षा की ओर मोड़ना होगा। हमें एक ऐसा माहौल तैयार करना होगा जिसमें ‘वेद और वेब’ का समन्वय हो सके। यह समन्वय ही नवीनता, नैतिकता और स्थिर विकास का आधार बनेगा।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि, आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया के कारण युवाओं में मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं।

उपनिषद और भगवद गीता का ज्ञान उन्हें मानसिक स्थिरता, विवेक और आंतरिक मजबूती प्रदान करता है। इसके अलावा वैदिक गणित, न्याय दर्शन और तर्कशास्त्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा साइंस के सिद्धांतों से बहुत मेल खाते हैं।

अगर युवा इन सिद्धांतों को समझकर कोडिंग या AI मॉडल बनाएंगे, तो वे केवल तकनीकी निर्माता नहीं बल्कि अतुलनीय अन्वेषक (Innovators) बनेंगे।

भारत को ‘जेन-जी’ को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए व्यापक ढांचा तैयार करना होगा। सबसे पहले तो स्कूलों और कॉलेजों में आधुनिक STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित) शिक्षा के साथ IKS (भारतीय ज्ञान परंपरा) का व्यावहारिक समावेश करना होगा। इसके अलावा संस्कृत भाषा में कोडिंग और प्रोग्रामिंग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि संस्कृत को कंप्यूटर एल्गोरिदम के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना गया है। इसके साथ ही अनुसंधान (रिसर्च) क्षेत्र में बजट बढ़ाना होगा। जेन-जी युवाओं को आयुर्वेदिक न्यूट्रास्युटिकल्स, वैदिक स्थापत्य पर आधारित ग्रीन बिल्डिंग्स, और ईको-फ्रेंडली तकनीक पर काम करने के लिए प्रोत्साहन और स्टार्टअप फंड प्रदान करना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, समाज के हर क्षेत्र में युवाओं को नेतृत्व सौंपना होगा। चाहे वह स्पेस टेक्नोलॉजी हो, फिनटेक हो या फिर बायोटेक्नोलॉजी—युवाओं को मार्गदर्शन और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

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