Wabi – Sabi का तत्वज्ञान दूर करेगा अवसाद-भय-चिंता से… !
Wabi – Sabi का तत्वज्ञान
दूर करेगा अवसाद-भय-चिंता से… !
■ डिप्रेशन और तनाव का मूल कारण :- दुनिया के मापदंड के अनुसार जो प्राप्त नहीं हुआ, उस स्थिति का स्वीकार करने से इन्कार ।
■ तीन बड़ी चुनौतियाँ :- वर्तमान स्थिति से तनावपूर्ण रहना, परिवर्तन का डर सताना और अपूर्ण होने का रंज ।
जापान में बौद्ध तत्वज्ञान पर सैकड़ों किताबें लिखी गई हैं । सेमिनार और वक्तव्य आयोजित होते हैं । अब तो स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी उसकी स्टडी होती है । अमेरिका और यूरोप में अंग्रेजी में अनुवादित हुई किताबें बेस्ट सेलर बनी है ।
आज दुनिया में लाखों नागरिक डिप्रेशन और लघुता ग्रंथि से पीड़ित हैं । ऐसे समय में ये तत्वज्ञान वर्तमान समय में तेजी से स्वीकार्य हो रहा है और लोगों को अनिवार्य लगने लगा है । वो तत्वज्ञान है Wabi – Sabi की समझ ।
Wabi – Sabi का सरल अर्थ है कि “हम दुनिया की या बहुमति की नजर से सौंदर्य या प्रकृति के रूप में चाहे किसी त्रुटि, कोई कमी या अपूर्णता से ग्रस्त हों, लेकिन उसके बावजूद आत्मसम्मान और आत्मविश्वास के साथ उसका स्वीकार करें ।” मतलब कि हम दुनिया के मापदंडों के अनुसार, दुनिया की मानी गई मान्यता, सोच, संपूर्णता (जैसा होना चाहिए वैसा न होना) या परफेक्ट की व्याख्या में फीट न बैठते हों, तो वह अपूर्णता है । तो उसी मिजाज को स्वीकार करना – कुछ इस तरह का मैसेज है इस तत्वज्ञान का !
अपूर्णता से समाधान कर लेने या मन मारकर उसका स्वीकार कर लेने की बात इस तत्वज्ञान में नहीं है, लेकिन उसका सहज स्वीकार करते हुए जिस भी क्षेत्र में हों, उसमें छा जाने का आत्मविश्वास डेवलप करने पर जोर दिया गया है ।
श्रीजीत क्रिष्णन नाम का युवक बौद्ध धर्म के तत्वज्ञान की समझ देनेवाले वीडियो सोश्यल मीडिया में पोस्ट करता है, जिसकी बड़ी संख्या में फॉलोविंग है । Wabi – Sabi के तत्वज्ञान के लिए उसने फिल्म अभिनेता रजनीकांत का उदाहरण दिया है कि कैसे 73 वर्ष में भी वो अपनी उम्र को छिपाए बिना, विग सहित के गेटअप में दिल धड़क एक्शन दृश्य देते हैं । लेकिन पब्लिक लाइफ में जैसे हैं, वैसे ही विश्व के सामने पेश होते हैं । सामान्य कद-काठी, पक्का श्याम रंग और सिंपल बिना ब्रांड के शर्ट-पैंट । कभी बूट, कभी शादी चप्पल । उनके चेहरे पर हल्के धब्बे भी काले रंग के देखे जा सकते हैं, उसके बावजूद कोई प्लास्टिक सर्जरी नहीं या टेलकम पाउडर नहीं । जैसे हैं । उनकी टाल को ढकने कोई हेयर ट्रांसप्लांट भी नहीं और हेयर वीविंग भी नहीं करवाते । जिस गोगल को अंगुली पर नचाकर वे तालियाँ बजवाते हैं, वो गोगल भी मुश्किल से एकाध-सौ रुपये का होता है ।
फिल्मी पर्दे पर विग के साथ एक्शन दृश्य करनेवाले 73 वर्षीय रजनीकांत – वास्तविक जीवन में जैसे हैं, वैसे ही प्रस्तुत होने में किसी शर्म-संकोच-दुविधा का अहसास नहीं करते ! वो फिल्मी प्रस्तुति, ये असली प्रस्तुति । दोनों प्रस्तुतियाँ निःसंकोच ! ‘आप मुझे पर्दे पर स्वीकार करो या न करो, मुझे परवाह नहीं’ – इस मिजाज से रहना मतलब Wabi – Sabi.
अपूर्णता का आत्मविश्वास के साथ केवल स्वीकार ही नहीं करना,अपितु उसकी बिल्कुल परवाह किए बिना स्वयं को दुनिया के समक्ष जैसे हैं, वैसे प्रस्तुत करना – ये सद्गुण विकसित करने की आज दुनिया को बहुत जरूरत है । आडंबर में, अप्राकृतिक और दिखावे में हम हमारा सहज ओरिजनल लुक, नेचर, स्वभाव खो देते हैं, खोते जा रहे हैं । हमारी असलियत, ओरिजनलिटी दबती जा रही है, ढँकती जा रही है । मानो पूरी लाइफ एक आर्टिफिशियल बन गई है । मात्र दिखावा । लघुता ग्रंथि से ग्रसित लोगों की संख्या भी बेशुमार बढ़ी है ।
कई केस तो ऐसे हैं कि कोई त्रुटि कभी न हो, तब भी ढूँढ़ लेते हैं और भी भीतर ही भीतर ग्रंथि से पीड़ित होते रहते हैं । जैसे मेरे शरीर का रंग सांवला है, मेरा कद छोटा है, मेरी मोटाई ज्यादा है, ठिंगनापन है, मेरी नाक, मेरी आँखें – वैसी नहीं है, जैसी उसकी है, मेरी लंबाई ज्यादा है, पतलापन ज्यादा है, बाल ठीक नहीं है – जैसी कई धारणाएँ, कमियाँ अपने ही शरीर को लेकर निकालते हैं और भीतर ही भीतर अवसादग्रस्त, तनावग्रस्त रहते हैं । ये तो हुई शारीरिक अपूर्णता की बात ।
मानसिक बीमारी तो बड़ी पेचीदी है । मैं लोकप्रिय नहीं हूँ, लोग मुझे चाहते नहीं हैं, मुझे कोई जानता नहीं है, मेरे पास कोई आता नहीं है, मुझे कोई याद करता नहीं, मुझसे कोई प्रेम करता नहीं है, मेरे से कई लोग आगे निकल गए, मैं समर्थ नहीं, सक्षम नहीं, मैं निपुण नहीं, मुझे कुछ आता नहीं, मैं विफल हूँ, मैं कुछ कर पाने में असमर्थ हूँ – जैसे कईयों विचार व अवधारणाएँ, जिसकी लंबी-चौड़ी लिस्ट बन सकती है ।
ऐसी नकारात्मक सोच से, विचार से मन अवसाद, तनावग्रस्त रहता है । व्यक्ति अपनी क्षमताओं का उपयोग नहीं कर पाता और अपनी मानी हुई ग्रंथि से पीड़ित रहता है । आत्मघाती विचारों के कारण जीवन जीने का कोई चार्म ही नहीं रहता !
तो पाँच बातों पर ध्यान दें –
(1) जो है उसका सहज स्वीकार ।
(2) कोई संपूर्ण होता ही नहीं, पूर्ण होने का प्रयत्न करने के बजाय, जो जैसे हैं उसीमें खिलना है ।
(3) सौंदर्य भावनागत है – दुनिया के मापदंडों ने बनाया सौंदर्य सच्चा नहीं है ।
(4) वर्तमान में जीना और हर कर्म का आनंद लेना ।
(5) जो है उसकी कद्र करना, सदुपयोग करना ।
ये है Wabi – Sabi का तत्वज्ञान । तो चलिए, जैसे हैं, हमारे पास जो भी है, उसी में से आनंदित रहने की कला विकसित करें ।
(संदर्भ :- गुजरात समाचार)
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