दूर रहकर भी दिल से दिल का जुड़ाव हो सकता है !

दूर रहकर भी दिल से दिल का जुड़ाव हो सकता है !

दूर रहकर भी दिल से दिल का जुड़ाव हो सकता है !

जिंदगी मीठी प्यास है, अपने-अपने ढंग से सब बुझाते हैं । माता-पिता की प्यास अपने बच्चों को देखकर ही तृप्ति में बदल जाती है । आजकल ज्यादातर माता-पिता इस बात से परेशान हैं कि बच्चे दूर चले गए और जाकर हमें भूल गए । विस्मृति के शूल से आजकल अधिकांश मातृत्व-पितृत्व आहत है । माता-पिता चाहते हैं, बच्चे उन्हें याद तो रखें । बच्चे भी भूलना नहीं चाहते, लेकिन जीवनशैली ऐसी बन गई कि चाहकर भी चाहा हुआ नहीं होगा । घरों में माता-पिता और बच्चे एक प्रयोग करें । योग विज्ञान के अनुसार स्मृति केवल मस्तिष्क में ही नहीं, नेत्रों में भी बस्ती है । सामान्य बातचीत के समय माता-पिता और बच्चे एक-दूसरे की आँख में आँख डालकर बातचीत अवश्य किया करें । बच्चे यदि माता-पिता से दूर हो तो आँखें बंदकर आज्ञा चक्र में भीतर से देखें । दोनों भौंहों के बीच स्थित आज्ञाचक्र पर माता-पिता की छवि देखें । स्कंद पुराण के अनुसार आँखों में श्वेत भाग पिता और काला भाग माता का माना गया है । यह प्रयोग शरीर से निकलनेवाली तरंगों को प्रभावित करेगा और भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़ने में मदद करेगा, वरना जिंदगीभर यह कहते हुए वक्त गुजर जाएगा कि कोई पटवारी ऐसा मिले, जो एक के दिल का पट्टा दूसरे के नाम कर दे । ये दिल से दिल का जुड़ाव दूर रहकर भी आप स्वयं कर सकते हैं ।

– पं. विजयशंकर मेहता

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