क्या आप अपने जीवन की सही दिशा जानते हैं ?

क्या आप अपने जीवन की सही दिशा जानते हैं ?

क्या आप अपने जीवन की सही दिशा जानते हैं ?

सत्संग करो मिल भाई, छोड़ो जग की चतुराई ।

चुन-चुनकर ईंटे और पत्थर ऊँचे मंजिल वास किया,

हरि भजन का समय अमोलक, उसका सत्यानाश किया,

निर्बल और गरीबों की कछु करी नहीं सुनवाई |

सत्संग करो मिल भाई, छोड़ो जग की चतुराई ।

कितनी कला सीख लो पढ़ लो, कुछ भी काम ना आएगी,

पद-अधिकार मिलकियत सारी, मिट्टी में मिल जाएगी ।

काल बली की चोट लगे जब, खोज खबर नहीं पाई,

सत्संग करो मिल भाई…

मूढ़ होयकर भजो हरि को, वृथा नहीं बकवाद करो,

भजन-कीर्तन, सेवा-सत्संग, पल-पल प्रभु को याद करो ।

जीवन ऊँचा उठ जाएगा, फरक नहीं है राई,

सत्संग करो, सत्संग करो, सत्संग करो मिल भाई ।

और यह नियम है कि जिसके जीवन में सत्संग का महत्त्व नहीं, वह कुसंग जरूर करेगा । अच्छे रास्ते नहीं जाएगा तो बुरे रास्ते अवश्य जाएगा, नेक कर्म नहीं करेगा तो गलत कर्म करेगा, इसलिए अपना कल्याण स्वयं करें । भगवान श्रीकृष्ण गीता में कह रहे हैं –

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ (६.५)

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ॥ (६.६)

कि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु । आत्मकृपा होगी, गुरुकृपा भी काम करेगी, ईश्वरकृपा भी काम करेगी तो अपने आप को पतन के गर्त में न डालें । अपने आप का कल्याण करें, अपने आपका मित्र बनें । तो सत्संग में महापुरुषों के चरणों में यह बात समझने की और सीखने की है कि विपरीत परिस्थितियों में, प्रतिकूल माहौल में, विध्न-बाधाओं के बीच वो कैसे प्रसन्न रहते हैं ? कैसे मुस्कुराते हैं ? 

मुस्कुराकर गम का जहर, जिनको पीना आ गया;

यह हकीकत है कि जहाँ में, उनको जीना आ गया ।

तो विध्न-बाधाओं को पैरों तले कुचलने की ताकत महापुरुषों के पास होती है । उनके आगे तनाव क्या करेगा ? उनके आगे चिंता क्या करेगी ? मुसीबतें भी उस मर्द के पास जाकर परेशान हो जाती हैं, जो मुसीबतों से परेशान नहीं होता ।  इसलिए सदैव प्रसन्न रहना, सदैव हँसमुख रहना और निराशा, हताशा आए तो उसको ॐकार की गदा से भगाना । यह ओंकार मंत्र बड़ा पावरफुल है । 

फ्रांस के डॉक्टर लेवर लिजारियो कहते हैं, ह्रीं, ह्रीं, ह्रीं, ह्रीं ऐसा जप करने से अन्ननली की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं । ह्रों, ह्रों, ह्रों, ह्रों इस प्रकार जो जप करता है श्वासनली की बीमारियाँ मिटती हैं ।  हर, हर, हर, हर इस प्रकार जप करने से पाचनतंत्र ठीक काम करने लगता है, लेकिन जो ओंकार मंत्र का जप करता है उसका सात चक्र, सोलह उपत्तिकायें, साढ़े तीन करोड़ रोमकुप में उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है । ७२ हजार नाड़ियाँ जो आपके शरीर में हैं उन ७२ हजार नाड़ियों में भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है । तो ओंकार मंत्र जब-जब स्ट्रेस हो, डिप्रेशन हो तो गहरी साँस लो, पूर्व दिशा के सामने अथवा उत्तर दिशा की ओर बैठकर ओंकार का लंबा गुँजन करो । तीन प्रकार से गुंजन होता है । एक दीर्घ स्वर, एक ह्रस्व स्वर और एक प्लुत । इन तीनों प्रकार से जप करने के अलग-अलग प्रभाव हैं । 

अधिकम् जपम् अधिकम् फलम् । 

मंत्र जाप की महिमा बड़ी विलक्षण है । जिन लोगों ने दीक्षा ली है, उनके जीवन का यह अनुभव है कि दीक्षा के प्रभाव से उनके जीवन को प्रॉपर दिशा, प्रॉपर गाइडेंस मिली है और जिसके जीवन में ठीक से दिशा आ गई उसके जीवन की धारा ठीक चलती है और लक्ष्य तक पहुँचती है । आप जानते हैं कि जिस नाव या जिस जहाज की दिशा तय नहीं, जिस गाड़ी की दिशा तय नहीं कि कहाँ जाना है ? ड्राइवर को पता नहीं कि कहाँ जाना है ? तो वह गाड़ी कहाँ ले जाएगी, जहाँ गली दिखेगी वहीं ले जाएगी । घोड़े के ऊपर बैठनेवाला सवार यदि जानता नहीं की घोड़े को कहाँ ले जाना है तो वह कैसे ले जाएगा ? तो लगाम लगा लें और दिशा तय कर लें, लक्ष्य तय कर लें, तब तो ठीक है जाना और बैठना, नहीं तो कहाँ जायेंगे ? ड्राइवर को पता होना चाहिए कि गाड़ी कहाँ ले जाना है । ऐसे ही यह शरीर है गाड़ी और आप हो आत्मा इसके ड्राइवर । आपको पता होना चाहिए कि हमें शरीर को और मन को कौन-सी दिशा में ले जाना है ? कहाँ ले जाना है ? यह अगर पता है तब तो गाड़ी ठीक जाएगी और पता नहीं है, तो फिर तो गड़बड़ हो जाएगी | और इसलिए कई लोग ऐसे हैं जिन्हें पता ही नहीं कि कहाँ जा रहे हैं ? कमाते क्यों हो ? बोले – खाने के लिए । खाते क्यों हो ? तो बोले – जीने के लिए और जीते क्यों हो ? पता ही नहीं । बोले – मरने के लिए । मरने के लिए जीते नहीं है, जीते हैं मुक्त होने के लिए । परमानंद का अनुभव करने के लिए तो मानव जीवन मिला है, लेकिन वह तो मिला नहीं और उसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्न भी करते नहीं तो फिर तो दिशाविहीन ही हो गए । ठीक कहा है – 

लक्ष्य न ओझल होने पाए, कदम मिलाकर चल ।

सफलता तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल ॥

मत देखो कितनी दूरी है, कितना लंबा मग है,

और न सोचो साथ तुम्हारे आज कहाँ तक जग है ?

लक्ष्य प्राप्ति की बलिवेदी पर, अपना तन-मन वारो,

हिम्मत कभी न हारो साधो, हिम्मत कभी न हारो ।

लहरों से डरकर नौका कभी पार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती ।

नन्हीं-सी चींटी दाना लेकर चढ़ती है, फिसलती है सौ बार फिर-फिर से ऊपर चढ़ती है | उसकी हर कोशिश, बेकार नहीं होती और कोशिश करनेवाले की कभी हार नहीं होती । 

We Will Find A Way

चलते रहो, चलते रहो, चलते रहो ।

मत देखो कितनी दूरी है, कितना लंबा मग (मार्ग) है,

और न सोचो साथ तुम्हारे आज कहाँ तक जग है ?

कौन अच्छा बोल रहा है ? कौन बुरा बोल रहा है ? इन बातों पर तुम्हारा ध्यान नहीं जाना चाहिए । हाथी चलता है और कुत्ते भोंकते हैं, तो हाथी उनको चुप कराने के लिए भागेगा क्या ? बिल्कुल नहीं । तुम हाथी की तरह मस्ती से चलते चले जाओ और कोई अगर निंदा करता है, तो उसकी निंदा उसको मुबारक । कोई प्रशंसा करता है तो वह जाने, कोई निंदा करता है तो वह जाने, लेकिन तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे सामने स्पष्ट होना चाहिए । अपने लक्ष्य की तरफ नजर रखते हुए आगे बढ़ते रहो, चाहे अकेले ही सही चलते रहो, चलो सूरज की नाई, चलो चंद्रमा की नाई, चलो जैसे गंगा नदी गौमुख से निकलती है कल-कल, छल-छल, नाचती-कूदती-उछलती समुद्र से जाकर मिलती है अपने लक्ष्य में । ऐसे ही हमारे जीवन की धारा, हमारे जीवन की वृत्ति, हमारे जीवन का जो ध्येय है, उस ध्येय को प्राप्त करने के लिए अखंड वृत्ति, निष्ठा, श्रद्धा, प्रेम और विश्वास के साथ अडिगता के साथ हमें आगे चलना है । 

जैसे मीराबाई के जीवन में दृढ़ता थी, जैसे ध्रुव और प्रह्लाद के जीवन में दृढ़ता थी, जैसे नामदेव, तुकाराम और ज्ञानेश्वर महाराज के जीवन में दृढ़ता थी । मीरा की दृढ़ता गजब की है, पार्वती की दृढ़ता गजब की है । छूटे देह न छूटे नेमा । यह मेरी देह छूट जाएगी तो छूट जाएगी लेकिन मेरा जो नियम है जो मैंने सोचा है, जो मैंने ठाना है वो तो मैं नहीं छोड़ूँगी कि –

जन्म कोटि लगि रगर हमारी ।

बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥

मैं वरुँगी तो शंकर भगवान को वरुँगी और चाहे कुँवारी रह जाऊँ तो कोई बात नहीं । एक जन्म तो क्या, दो जन्म तो क्या, करोड़ों-करोड़ों जन्म हो जायें, लेकिन मैं मेरी यह निष्ठा, मेरा व्रत, मेरी दृढ़ता और मेरा संकल्प मैं नहीं छोडूँगी । देखो कितनी दृढ़ता है ! तो भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – 

भजन्ते मां दृढव्रताः ।।

भजन कैसे करना चाहिए ? कि दृढ़वृति होकर करना चाहिए । डावाडोल नहीं होना । जो मन है उसको स्थिर करके । तो पढ़ने में दृढ़ता होती है सफलता मिलती है । जो बिजनेस है, जॉब है उसमें भी दृढ़ता होती है तो सफलता मिलती है । ऐसे ही अपने लक्ष्य के प्रति, अपने ध्येय के प्रति भी दृढ़ता जितनी होगी, उतना ही जीवन में सफलता निश्चित रूप से मिलेगी ।

Leave comments

Your email is safe with us.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.