झूठे आरोप सहना, उनका मुकाबला करना भी महान तपस्या है !

आज एक सुभाषित मेरे पढ़ने में आया जिसे यहाँ लिख रहा हूँ । बहुत मस्त लगा।

धवलयति समग्रं चन्द्रमा जीवलोके

किमिति निजकलङ्कं नात्मसंस्थं  प्रमार्ष्टि  |

भवति विदितमेतत्प्रायशः सज्जनानां

परहितनिरतानामादरो  नाSSत्मकार्ये   || 

इस सुभाषित का सार ये है कि : चंद्रमा की शीतल श्वेत ज्योति से समग्र जगत अंधकार में भी प्रकाशित हो सकता है, लेकिन वह चन्द्रमा अपने कलंक मिटा नहीं सकता इस तरह परोपकार का कार्य करनेवाले सज्जन लोग दूसरों के लिए चाहे जितनी भी महनत या परिश्रम करें, लेकिन उनके हिस्से में कुछ दाग तो बिना दोष के आते ही हैं। ( इस बात के कई प्रमाण दिये जा सकते हैं)

इस जगत् में कई महान पुरुष, महान नारियाँ हुई हैं जिन्होंने बिना गलती, बिना दोष, बिना अपराध के बहुत सहा है । झूठे इल्जाम, झूठे आरोप, झूठे बेबुनियाद आक्षेपों के कारण भयंकर बदनामी, अपमान, अवमान, तिरस्कार, बहिष्कार सहन करने वाले, महान व्यक्तियों को अनंत प्रणाम । 

झूठे आरोप सहना, उनका मुकाबला करना भी महान तपस्या है।

 

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