क्या मनुष्य वास्तव में वानर से विकसित हुआ?
डार्विन के उत्क्रांति के सिद्धांत (Theory of Evolution) को चुनौती देनेवाले सृजनवादी (विकासवादी) वैज्ञानिक…
- देवेश मेहता
जीव विज्ञान का अध्ययन करनेवाले सभी ‘उत्क्रांति के सिद्धांत’ को प्रस्तुत करनेवाले ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के नाम से परिचित होंगे ही । चार्ल्स डार्विन ने विलियम बेटसन और आलफ्रेड वोल्स के साथ संशोधन करके “द ओरिजन ऑफ स्पेसिज” और “द डिसेंट ऑफ मैन” नामके दो पुस्तकों में थियरी ऑफ इवोल्यूशन (विकासवाद का सिद्धांत) का उल्लेख किया था । चार्ल्स डार्विन का मत था कि प्रकृति परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है । उन्होंने इस सिद्धांत को प्रस्तुत कर समझाया कि सबके पूर्वज एक ही हैं । हरेक प्रजाति चाहे वो वृक्ष, पशु या मानव की हो, एक-दूसरे से संबंधित हैं और मूलतः एक से ही बदल-बदलकर आते हैं । 1858 ई. में डार्विन ने इस विकासवाद के सिद्धांत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करके ब्रांचिंग पैटर्न ऑफ इवोल्यूशन के लिए, उसके अस्तित्व के लिए संघर्ष और प्राकृतिक पसंदगी अर्थात् कुदरती चयन के बारे में बात की । इसमें उन्होंने कहा कि सभी विशेष प्रकार की प्रजाति पहले एक ही थी, लेकिन दुनिया के अलग-अलग भौगोलिक स्थिति में जीने-रहने के संघर्ष में उनकी संरचना में परिवर्तन आ गया और इसी कारण एक ही प्रजाति अनेक प्रजाति बन गई ।
चार्ल्स डार्विन के बाद के संशोधकों ने इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए येन केन प्रकारेण गाँठ जोड़कर वानर से मानव बनने तक की विकास यात्रा की क्रमबद्ध श्रृंखला तैयार कर दी । हालाँकि इसके बीच की अनेक कड़ियाँ अभी तक नहीं मिली हैं । इन महत्त्वपूर्ण त्रुटियों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए उत्क्रांतिवाद या विकासवाद के अनुयायियों और समर्थकों ने “सेलेटेटरी थियरी” नाम का एक नया सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार उन्होंने यह प्रस्तुत किया कि मानव की उत्क्रांति प्रक्रिया या विकास कार्य में बीच में एक ऐसी जगह आई जहाँ प्रगति एकदम रूक गई और फिर अचानक इतनी तेजी से शुरू हो गई की प्राणी की शारिरिक संरचना पहले से बहुत बदल गई । अर्थात् विकास यात्रा ने बीच में रुककर फिर ऊँची छलांग लगाई । उनके अनुसार इस कारण ही दोनों एक-दूसरे से मिलते आ रहें हैं, ऐसी कोई कड़ी नहीं मिल रही ।
चार्ल्स डार्विन और उनके अनुयायी कहते हैं कि मनुष्य के पूर्वज पहले वानर थे लेकिन कई सारे वानर अलग-अलग जगह, अलग-अलग तरह से रहने लगे, इस तरह उनकी आवश्यकता अनुसार उनमें परिवर्तन आने लगा । यह रूपांतरण उनकी अगली पीढ़ी में दिखाई देने लगा । यह बदलते समय के साथ ऐसा बदला की क्रमिक विकास होते-होते वानर की प्रजाति मानव बन गई । मेरूदंडी समुदाय के प्राणी उराँगउटांग की एक संतान पेड़ पर और एक जमीन पर रहने लगी । जमीन पर रहनेवाली संतान ने स्वयं को जीवित रखने के लिए नई रहन-सहन विकसित कर ली, जैसे कि खड़ा रहना, दोनों पैरों पर चलना, हाथ का उपयोग करना, पेट भरना, शिकार करना, खेती करना इत्यादि । इस तरह उराँगउटांग की दूसरी संतान मानव बन गयी ।
चार्ल्स डार्विन का उत्क्रांति का सिद्धांत और क्रमिक विकास का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत और गलतियों से भरा है, ऐसा अनेक आधुनिक काल के जीव वैज्ञानिक मानते हैं । जीव विकास के समर्थक, जीवन के प्रादुर्भाव का कारण निर्जीव रसायनों को मानते हैं । उनका ऐसा मत है कि आदिमानव काल में अनेक रसायनों की परस्पर क्रिया से ‘एमिनो एसिड बने । जो बाद में जीवन विकास के लिए जिम्मेदार रहा । इस तरह बने हुए एक कोषी जीवाणुओं में से समय पाकर जटिल संरचनावाले बहुकोषी जीवाणुओं की उत्पत्ति हुई । अगर इस मान्यता को सच मानें तो अनेक जटिल प्रश्न खड़े होते हैं । उचित तरह से जुड़े रासायनिक तत्त्वों को पारस्परिक क्रिया की प्रेरणा कहाँ से मिली ? जड़ पदार्थों में चेतना का प्रादुर्भाव कैसे संभव बन पाया ?
इन हालातों में सूक्ष्म रचनाकार के अस्तित्व को स्वीकार करने से सभी विसंगतियाँ दूर हो जाती हैं, ये अनेक वैज्ञानिक मानते हैं । आधुनिक विकासवाद या नव डार्विनवाद के अनुसार म्यूटेशन विकासवाद का निमित्त कारण है । म्यूटेशन गुणसूत्रों या जीन्स में से आकस्मिक परिवर्तन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है । विशेषज्ञ बताते हैं कि इस परिवर्तन के दर की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और यह भी अंदाजा लगाना संभव है कि कितने अनुकूल म्युटेशन्स विकासवादी परिवर्तन के लिए जरूरी हैं ।
इसके साथ ही यह गिनती भी संभव है कि एक जीवाणु में से पूर्ण मनुष्य में रूपांतरित होने के लिए कितना समय जरूरी है । डार्विन के उत्क्रांति के सिद्धान्त – के क्रमिक विकासवाद की प्रबल विरोधी अमेरिकन बायोकेमिस्ट और बायोलॉजिस्ट, इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिएशन रिसर्च, सान डियेगो, केलिफोर्निया एसोसिएट डिरेक्टर ड्वेन टोल्बर्ट गिश ने निष्णात गणितज्ञों द्वारा गिनती भी कराई । एक कोषी जीवाणु में से रूपांतरित होकर मानव बनने की समय सीमा जो उन्होंने दी, वो पृथ्वी की उतपत्ति हुई उससे भी अनेक अरबों वर्ष लंबा था । वैज्ञानिक पृथ्वी को 5 अरब वर्ष पहले उत्पन्न हुई बताते हैं ।
यह विश्लेषण क्रमिक विकासवाद का खंडन करते हैं । जीवाणु के एक कोष से दो भेद नर और मादा कैसे हुए ? अगर अमीबा के बाद दो कोषों का हाइड्रा हुआ, तो क्रम से सभी योनियाँ दुगुने परिणाम से क्यों आगे नहीं बढ़ती ? यदि सरीसृप जीवों से पंखवाले जीव विकसित हुए तो उस क्रम में जो पंखवाले जीव हैं और जो उड़ सकते हैं, वो कौन-सी विकास प्रक्रिया पर आधारित है ? ऐसे अनेक प्रश्नों के जवाब नहीं मिलते हैं । इसलिए ड्वेन गिश जैसे सर्जनवादी वैज्ञानिक बताते हैं कि सृष्टि की संरचना और प्राणियों की उत्पत्ति के पीछे सर्जनहार भगवान की शक्ति है और मनुष्य की तरह सभी प्राणियों की उत्पत्ति स्वतंत्र रूप से हुई है । इसमें किसीका किसीसे कोई संबंध नहीं है और किसीका एक से दूसरे रूप में रूपांतरण नहीं हुआ है ।
एक कोशीय अमीबा प्रारंभ में अमीबा ही था, अभी भी अमीबा है और जब तक सृष्टि का अस्तित्व है तब तक अमीबा का ही रहेगा | बंदर पहले भी बंदर था और सदा बंदर ही रहेगा । मनुष्य पहले से मनुष्य था और हमेशा मनुष्य ही रहेगा । इसके मूलभूत संरचना में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है और न ही कभी परिवर्तन होगा | इस प्रकार ‘क्रिएशनिज्म’ का सिद्धांत प्रस्तुत करनेवाले वैज्ञानिकों का मानना है कि अमीबा से पशु और बंदर से इंसान बनने की बात संपूर्णत: गलत है ।
श्रीमद् भागवत के तीसरे स्कंध के पाँचवें अध्याय में विस्तार से बताया गया है कि कैसे भगवान ने अपनी इच्छा और शक्ति से ब्रह्मांड की रचना की । मनुस्मृति का प्रथम अध्याय के 74-75 श्लोक में मनु महाराज कहते हैं कि – ‘सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने सृजन की इच्छा से प्राणधारी जीवों को उत्पन्न किया । वेद-उपनिषद, विष्णु पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्मसंहिता जैसे अनेक शास्त्रों में उल्लेख है कि इस सृष्टि के रचयिता परब्रह्म परमेश्वर हैं ।
1923 ई. में, संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिम स्थित नेवाडा राज्य की खुदाई के दौरान 6,00,000 साल पुराने चप्पल मिले थे । उस चप्पल की सिलाई और धागों की मरोड़ तथा मात्रा इतनी समानुपाती है और इतनी कुशलता से सिली गई है कि आश्चर्य होता है ! क्रमिक विकास के सिद्धांत के अनुसार 60,000 वर्ष पूर्व आदि मानव ने इस धरती पर पैर रखा था, तो नेवाडा की 6,00,000 वर्ष पुरानी मानव संस्कृति और सभ्यता का विकास किसने किया था ! उसका अस्तित्व कहाँ से संभव हुआ ? इस तरह के कई उदाहरण किसीको भी यह मानने पर विवश कर देते हैं कि डार्विन का सिद्धांत सही नहीं है !
हम भारतवासी तो मानते हैं कि हमारे पूर्वज वानर नहीं थे, अपितु ऋषि – मुनि थे ! इस आधार पर भी डार्विन कि थ्योरी गलत साबित होती है। हमारे कुल, परंपरा, गोत्र – वंश भी हज़ारों वर्ष पुराने हैं।