सिम्युलेशन थ्योरी : अब टेक्नोलॉजी भी कहती है कि जगत मिथ्या है !
सिम्युलेशन थ्योरी : अब टेक्नोलॉजी भी कहती है कि जगत मिथ्या है !
क्या यह दुनिया परम तत्त्व या प्रकृति नहीं, बल्कि किसी अत्याधुनिक कम्प्यूटर सिस्टम द्वारा चलाई जा रही हो सकती है ? मनुष्य सहित समूची जीव-सृष्टि, हमें जो कुछ भी दिखाई देता है-समझ में आता है, क्या वह सब किसी के ‘रिमोट कंट्रोल’ से संचालित होता हो सकता है ?
इस प्रकार देखें तो यह बात सैकड़ों-हज़ारों वर्ष पुरानी है, और इस प्रकार देखें तो बिल्कुल नई भी है । आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने जब से तेज़ी पकड़ी है, तब से यह बात नए रंग-रूप में, नए दृष्टिकोण के साथ सामने आई है । कौन-सी बात ? विश्व के सबसे धनाढ्य बिज़नेसमैन एलोन मस्क ने कुछ समय पहले एक कार्यक्रम में कहा था कि जिसे हम रियालिटी ( वास्तविकता ) कहते हैं, वह शायद रियालिटी भी न हो । संभव है कि हमारी मानवजाति, हमारे आसपास दिखाई देने वाली जीव-सृष्टि, हमारा पूरा ब्रह्मांड केवल एक एडवांस्ड सुपर कम्प्यूटर सिम्युलेशन भर हो । दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारा अस्तित्व, हमारी हस्ती और हम जो कुछ भी देखते-अनुभव करते-समझते हैं, उसमें से कुछ भी असली न हो, संभव है कि यह सब केवल कम्प्यूटर प्रोग्राम का परिणाम हो ।
यह समझ लें कि यह बात कहने वाले एलोन मस्क पहले नहीं हैं । निक बोस्ट्रॉम नाम के आधुनिक दार्शनिक ने 2003 में ‘आर यू लिविंग इन अ कम्प्यूटर सिम्युलेशन?’ शीर्षक वाले पेपर में सिम्युलेशन थ्योरी प्रस्तुत की थी । सिम्युलेशन थ्योरी कहती है कि जिसे हम अपनी वास्तविकता और हमारे चारों ओर फैली हुई प्रकृति कहते हैं ( जंगल, पहाड़, नदी-समुद्र आदि ), हम जो अनुभव करते हैं ( सुख-दुःख-उत्साह-डिप्रेशन जैसी भावनाएँ और यहाँ तक कि गुरुत्वाकर्षण बल जैसे भौतिकी के नियम ), जिसे हम मानवीय चेतना कहते हैं, वह सब भी असली न हो, ऐसा संभव है । यह सब एक अत्यंत विराट, अति-एडवांस्ड कम्प्यूटर-जनरेटेड प्रोग्राम हो सकता है, जिसकी रचना हमसे कहीं अधिक बुद्धिशाली किसी प्रजाति ने की हो ।
आगे बढ़ने से पहले सिम्युलेटर शब्द को और स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए । पायलट की ट्रेनिंग का उदाहरण लें । इस प्रशिक्षण के दौरान फ़्लाइट सिम्युलेटर का उपयोग किया जाता है । असली कॉकपिट जैसे दिखने वाले सिम्युलेटर में जैसे ही ट्रेनी पायलट बैठता है, तो विमान के सामने आकाश कैसा दिखेगा, नीचे धरती-समुद्र-बस्तियाँ-एयरपोर्ट आदि कैसे दिखाई देंगे, हवाई यात्रा के दौरान कैसी-कैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, उन-उन परिस्थितियों से किस प्रकार मार्ग निकाला जाए, कौन-से कमांड देने हों — ऐसी अनेक बातों की प्रैक्टिस कराई जाती है ।
आपने कम्प्यूटर गेम या वीडियो गेम खेले होंगे । उनमें अलग-अलग लोग होते हैं, जो गिरते-उठते हैं, लड़ाई-झगड़ा करते हैं, फ़ायरिंग करते हैं, तेज़ गति से कार चलाते हैं, आदि । टेक्नोलॉजी के विकास के साथ अब ऐसी वर्चुअल रियालिटी गेम्स आ गई हैं कि बिल्ट-इन हेडफ़ोन वाला खास प्रकार का हेडसेट पहनते ही आप स्वयं युद्ध के मैदान में या जंगल में या पहाड़ पर मौजूद हैं, ऐसा अनुभव होता है । सिम्युलेशन थ्योरी कहती है कि एक मिनट । आप इस समय जो हैं और जो कर रहे हैं, आपके आसपास जो लोग, मकान, वस्तुएँ हैं, क्या वह सब भी किसी एक ‘गेम’ का ही हिस्सा न हो ?
मनुष्य सदियों से कहता आया है कि इस दुनिया को चलाने वाला ऊपर बैठा है, हम उसकी कठपुतली हैं, वही हम सबकी डोर हिलाता है, आदि । इस ऊपर वाले को कोई भगवान कहता है, कोई परम सत्ता कहता है, तो कोई उसे ‘हायर पावर’ या अकथनीय उच्चतम शक्ति के रूप में पहचानता है । हम मानते हैं कि कोई ऐसा तत्त्व अवश्य है, जो जीव-सृष्टि का और सूर्य-चंद्र-तारों सहित समूचे ब्रह्मांड का नियमन करता है । यह परम शक्ति हमसे कहीं अधिक बुद्धिशाली कोई प्रजाति ही न हो, इसकी क्या गारंटी ? हमें तुरंत संत-ऋषियों द्वारा कही गई ‘जगत मिथ्या है’, ‘यह जगत केवल लीला है’ जैसी बातें याद आने लगती हैं । उच्चतम हिंदू दर्शन जिस गहन अर्थ में यह कहता है कि ‘हम हैं ही नहीं’, उसका भी स्मरण हो आता है । सिम्युलेशन थ्योरी के संदर्भ में ये सारी बातें किसी न किसी स्तर पर सत्य प्रतीत होती हैं । यदि हमारा ब्रह्मांड एक विराट सिम्युलेटर हो, हम स्वयं भी चैतन्यमय मनुष्य नहीं, बल्कि सुपर कम्प्यूटर द्वारा जनरेट किए गए पात्र हों, तो यह जगत अपने-आप मिथ्या ही बन जाता है, है न ?
सिम्युलेशन थ्योरी को केवल तरंग-तुक्का या साइंस फ़िक्शन का विषय मानने की भूल न करें । महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने 2400 वर्ष पहले लिखा था कि यह भौतिक जगत असली वास्तविकता नहीं है । यह उससे कहीं ऊँचे और शाश्वत एब्स्ट्रैक्ट स्वरूपों या आइडियाज़ की छाया या नकल मात्र है । अनेक शीर्ष वैज्ञानिक और चिंतक सिम्युलेशन थ्योरी को गंभीरता से लेते रहे हैं । वे कहते हैं कि आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जिस गति से विकसित हो रहा है, उसके आधार पर तो सिम्युलेशन थ्योरी के सही होने की संभावना निरंतर बढ़ती जा रही है । एलोन मस्क कहते हैं कि हम सिम्युलेटर में जी रहे हों, यह बात सही होने की संभावना एक अरब में से एक जैसी है ।
बाईस वर्ष पहले सिम्युलेशन थ्योरी सामने रखने वाले निक बोस्ट्रॉम ने तीन संभावनाएँ प्रस्तुत करके कहा था कि इन तीन में से कोई एक अवश्य सत्य होगी ।
संभावना 1: पोस्ट-ह्यूमन अवस्था आने से पहले ही अधिकांश मानवजाति लुप्त हो जाएगी । इसका अर्थ यह कि वर्तमान मानवजाति कभी अति-एडवांस्ड नहीं बन पाएगी । मानवजाति स्वयं विराट, अत्यंत यथार्थवादी प्रतीत होने वाली दुनियाएँ ( सिम्युलेशन ) बना सके, वह अवस्था कभी आएगी ही नहीं ।
संभावना 2 : मान लें कि मानवजाति अति-एडवांस्ड अवस्था तक पहुँच भी जाए, तब भी वह किसी भी कारण से उस दुनिया के सिम्युलेशन न चलाए, जिसे हम दुनिया कहते हैं । ( अर्थात संक्षेप में, हमारी दुनिया के अलग-अलग संस्करण न बनाए जाएँ । )
संभावना 3 : मान लिया जाए कि भविष्य में मानवजाति दुनिया के एक से अधिक नमूने (सिम्युलेशन) बनाती है । ऐसी स्थिति में सिम्युलेटेड दुनियाओं की संख्या, असली दुनियाओं की संख्या से कहीं अधिक होगी । इससे यह संभावना उत्पन्न होती है कि इस समय हम असली दुनिया के स्थान पर ऐसी किसी एक कृत्रिम रूप से बनाई गई दुनिया के भीतर उपस्थित हैं । सिम्युलेशन थ्योरी के समर्थकों की दलीलें भी जान लें । वे कहते हैं कि इस ब्रह्मांड के फ़िज़िकल कॉन्स्टैंट्स ( अचलांक ) आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत सटीक हैं । उदाहरण के रूप में, यदि गुरुत्वाकर्षण बल थोड़ा-सा भी कम-ज़्यादा होता, तो तारों का निर्माण न होता और पृथ्वी पर जीव-सृष्टि की उत्पत्ति ही न हो पाती । ऐसे अचलांक कैसे निर्धारित हुए ? दूसरी दलील के रूप में तेज़ी से विकसित होती कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को आगे रखा जाता है । यदि कम्प्यूटिंग पावर इसी गति से बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब एआई सिस्टम से सुसज्जित यंत्रमानव मनुष्य जैसी ही संवेदनाएँ अनुभव करने लगेंगे । भविष्य में ऐसा यथार्थवादी सिम्युलेटर बन सकता है, जिसमें बिल्कुल मनुष्य जैसे संवेदन-तंत्र वाले कृत्रिम मानव-जीवों के पूरे-के-पूरे नगर और समाज बसते हों । ‘टेक्नोलॉजिकल सिंग्युलैरिटी’ की परिकल्पना भी इसी दिशा की ओर संकेत करती है । टेक्नोलॉजिकल सिंग्युलैरिटी का अर्थ है ऐसा चरण, जहाँ मानवीय बुद्धिमत्ता से आगे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस निकल जाए, और वह इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ने लगे कि उस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण ही न रहे ।
यहाँ क्वांटम फ़िज़िक्स को भी याद करना चाहिए । क्वांटम फ़िज़िक्स कहता है कि प्रकृति दृश्य या स्थूल जगत में जिस प्रकार व्यवहार करती है, सूक्ष्म स्तर पर वह उससे बिल्कुल अलग ढंग से व्यवहार करती है । परमाणु, इलेक्ट्रॉन और प्रकाश के कुछ अजीबोगरीब व्यवहार देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का भी सिर चकरा जाता है कि ऐसा कैसे हो सकता है ? भौतिकी के कुछ नियम सूक्ष्म स्तर पर क्यों असफल हो जाते हैं ? क्या इन प्रश्नों का उत्तर यह हो सकता है कि फ़िज़िक्स के प्रचलित नियम ‘सिम्युलेटेड’ हैं, और इसी कारण हम स्कूल-कॉलेज में जो पढ़ते हैं, वह क्लासिकल फ़िज़िक्स और क्वांटम फ़िज़िक्स कई बार एक-दूसरे से विरोधाभासी प्रतीत होते हैं? कुछ वैज्ञानिक तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रकृति में कभी-कभी हमें भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट आदि के रूप में जो विचित्र घटनाएँ दिखाई देती हैं, वे वास्तव में और कुछ नहीं, बल्कि सिम्युलेशन में आए हुए ‘टेक्निकल ग्लिच’ होते हैं । सिम्युलेशन थ्योरी अनेक रोचक प्रश्न भी उत्पन्न करती है । जैसे कि, मान लें कि हम सिम्युलेशन में जी रहे हों, तो क्या उससे निकलकर ‘बाहरी दुनिया’ में जाना संभव है ? क्या हम इस सिम्युलेशन को बनाने वाले ‘महामानवों’ या परग्रहवासियों के साथ संवाद कर सकते हैं ? इन प्रश्नों के उत्तर मिलें, तब सही । तब तक इसी विषय पर बनी हॉलीवुड की सुपर-डुपर हिट ‘द मैट्रिक्स’ सीरीज़, जिम कैरी की अत्यंत विचित्र ‘द ट्रूमैन शो’ और ऐसी ही अन्य फ़िल्में देखकर आनंद लीजिए ।
- शिशिर रामावत द्वारा लिखित व पूज्य श्री नारायण साँईं जी द्वारा संकलित
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