अदालत उवाच
विचाराधीन कैदियों की रिहाई: जेल सुधार की दिशा में माननीय सर्वोच्च न्यायालय का एक निर्णायक कदम !
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने देश की 1382 जेलों में अमानवीय स्थितियों को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 479 को सभी राज्यों में प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता बताई है ।
विचाराधीन कैदी कौन होता है ?
वह व्यक्ति जो अपराध के मुकदमे की प्रतीक्षा में न्यायिक हिरासत में है । 78वें विधि आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, यह वह व्यक्ति भी हो सकता है जो जांच के दौरान हिरासत में है ।
भारत में विचाराधीन कैदियों की संख्या कुल कैदियों का 77% है, जो दोषियों से तीन गुना अधिक है ।
प्रमुख समस्याएं
- शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न: कैदी हिंसा, यातना, और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं ।
- आर्थिक असहायता: जमानत की राशि न भर पाने से जेल में रहना पड़ता है ।
- अत्यधिक भीड़भाड़: जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं, जिससे स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रभावित होती है ।
- परिवार पर असर: कमाने वाले सदस्य के जेल में होने से परिवार गरीबी में धकेला जाता है ।
- लंबी हिरासत: कई बार यह अवधि उस अपराध के लिए तय अधिकतम सजा से भी लंबी हो जाती है ।
- युवाओं पर प्रभाव: परिस्थितिजन्य अपराधी जेल में जाकर पूरी तरह अपराधी बन जाते हैं ।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां
- राज्यों की लापरवाही: राज्यों ने जेल सुधार को प्राथमिकता नहीं दी ।
- समाधान की कमी: राज्य वकील ठोस सुझाव देने के बजाय समय मांगते हैं ।
- जेल अधीक्षकों पर निर्भरता गलत: वे निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते ।
- सुविधाएं आवश्यक हैं: केवल बड़ा परिसर नहीं, बल्कि पर्याप्त शयन क्षेत्र, रसोई, चिकित्सा और गतिशीलता की सुविधा जरूरी है ।
- मौलिक अधिकारों की रक्षा: हिरासत में रहकर भी धारा 21 के तहत कैदियों के अधिकार बने रहते हैं ।
- पूर्व मामलों की पुनरावृत्ति: राममूर्ति बनाम कर्नाटक जैसे मामलों की समस्याएं आज भी बनी हैं ।
- सभी हितधारकों की जिम्मेदारी: न्यायालय ने आग्रह किया कि सभी को इस अवसर का लाभ उठाकर सुधार लाना चाहिए ।
बीएनएसएस की धारा 479 क्या कहती है ?
यह विचाराधीन कैदियों की हिरासत अवधि को अपराध की अधिकतम सजा अवधि से जोड़ती है ।
- यदि अपराध में मृत्युदंड/आजीवन कारावास नहीं है:
- आरोपी आधी सजा अवधि जेल में बिताने के बाद जमानत का पात्र है ।
- पहली बार अपराध करने वालों को सिर्फ एक-तिहाई अवधि पर बांड पर छोड़ा जा सकता है ।
- अदालत वैध कारणों से हिरासत बढ़ा सकती है ।
- कोई भी व्यक्ति अधिकतम सजा से अधिक समय तक जेल में नहीं रहेगा ।
यदि देरी अभियुक्त के कारण हुई हो, तो वह समय गणना में नहीं लिया जाएगा ।
- यदि किसी व्यक्ति पर एक से अधिक अपराध या मुकदमे चल रहे हैं, तो वह इस धारा के तहत जमानत का पात्र नहीं होगा ।
- जेल अधीक्षक निर्धारित अवधि पूर्ण होने पर अदालत को जमानत हेतु आवेदन देगा ।
धारा 479 की नयी विशेषताएं
- पहली बार अपराध करने वालों को एक-तिहाई अवधि पर बिना जमानत रिहाई ।
- एक से अधिक मामलों में जमानत नहीं मिलेगी ।
- जेल अधीक्षक की रिपोर्ट पर स्वतः जमानत का प्रावधान (उपधारा 3) ।
निष्कर्ष: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विचाराधीन कैदियों के अधिकारों की रक्षा और जेल सुधार के लिए बीएनएसएस की धारा 479 को प्रभावी रूप से लागू किया जाना अत्यंत आवश्यक है ।
स्रोत: लाइव लॉ पोर्टल
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