हम सद्गुरु को नमस्कार क्यों करते हैं ?
हम संतों की वंदना क्यों करते है ? हम सद्गुरु को नमस्कार क्यों करते है ? महापुरुषों की सेवा क्यों करते है ? उनके आगे क्यों नतमस्तक होते है ? क्योंकि उन्होंने अपने करने की, मानने की, जानने की तीनों शक्तियों का सदुपयोग किया । महान हो गए । अब उन्हें दुःख-सुख नहीं होता । उन्हें पीड़ा नहीं होती । कष्ट आता है लेकिन उन्हें भयभीत नहीं करता । विपदा तो आती है लेकिन उन्हें परेशान नहीं करती । क्योंकि वो सुखी होने के राज को समझे । उन युक्तियों को उन्होंने समझ लिया जिन युक्तियों को अपनाने से संसार के भारी से भारी दुःख स्पर्श नहीं करते । बच्चों से खिलौना तुम छीन लो वो रो पड़ते हैं क्योंकि नादान है । हम बच्चों की नादानियों पर हँसते है । महापुरुष हमारी नादानियों पर हँसते है । जहाँ सुख नहीं है, जहाँ रोना नहीं चाहिए । वहाँ बच्चा रो लेता है । जहाँ रोने का कोई मतलब नहीं वहाँ बच्चा रो लेता है क्योंकि नादान है । ठीक इसी प्रकार महापुरुष हम पर हँसते है कि जहाँ दुःखी नहीं होना चाहिए वहाँ ये दुःखी हो रहे हैं । जहाँ परेशान होने का मतलब नहीं वहाँ परेशान हो रहे हैं । ये नादानी है, ये बेवकूफी है, ये मूर्खता है, ये नासमझी है । ये नासमझी किसी यूनिवर्सिटी में न मिटेगी । किसी कॉलेज में, किसी स्कूल में न मिटेगी । ये नासमझी मिटेगी सत्संग में । ये नासमझी मिटेगी सद्गुरु के उस प्रसाद को पाने से ।