मन एक कल्पवृक्ष…
हमारा मन ही एक कल्पवृक्ष है । हम जैसा सोचते हैं, वैसा बन जाते हैं । तो भावना करें कि हम आनंद, शांति, धीरता, वीरता इस वायुमण्डल से अपने भीतर भर रहे हैं और हमारे भीतर जो अशांति है, उद्वेग है, दीनता-हीनता के विचार हैं, वे बाहर जानेवाले श्वास के साथ खाली कर रहे हैं । जितना इस भावना को दृढ़ करेंगे उतना ही अधिक शक्ति, साहस के सद्गुण हमारे भीतर प्रविष्ट होते जाएँगे ।
तीन व्यक्तियों का संसार के प्रति आकर्षण छूट जाता है । एक उसका जिसने विचार से अपने को तीनों शरीरों से असंग मान लिया है । एक है स्थूल शरीर, दूसरा है सूक्ष्म शरीर और तीसरा कारण शरीर । पर मैं इन तीनों शरीरों से अलग हूँ । मैं आत्मा हूँ, मैं आनन्द स्वरूप हूँ, मैं स्वयं ईश्वर का अंश हूँ । मैं शरीर नहीं हूँ, मैं बुद्धि नहीं हूँ, मैं चैतन्य स्वरूप हूँ, ॐ ॐ ॐ जो इस प्रकार स्वयं को तीनों शरीरों से असंग मानता है, उसीका मानव जीवन सफल है ।
दूसरा उसका जिसने आस्था, श्रद्धा, विश्वास से अपने को प्रभु का और प्रभु को अपना मान लिया है । इस अपनत्व से कि – ‘भगवान हमारे हैं और हम भगवान के हैं’ – साधक हर परिस्थिति में आनंदित रहता है । प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति को अपने प्यारे प्रभु का प्रसाद समझकर एक सच्चे आश्रित भक्त के हृदय से यही उद्गार निकलते हैं कि –
जो तिद् भावे सो भली कार !
बस, तेरी मरजी पूरण हो !
तीसरा – जो व्यक्ति पूरी शक्ति से, पूरी तत्परता से प्राणीमात्र की सेवा करता है वह भी सांसारिक आकर्षणों से मुक्त हो जाता है । जो भी कर्त्तव्य-कर्म सामने आ जाएँ, उन्हें पूर्ण तत्परता व निस्वार्थता से करने से आसक्ति और ममता का स्वत: नाश हो जाएगा ।
तो एकदम सीधा गणित है कि मन से ईश्वर का भजन करो, तन से नित्य सेवा करो और मिले हुए का सदुपयोग करने की कला सीख लो, इससे सरलता से संसार सागर से तर जाओगे । देखा जाए तो अपनी इच्छा, कामना, आसक्ति छोड़ने में जो सुख है, वह अपने मन की मरजी करने में नहीं है । मन के कहे अनुसार चलने से मनुष्य फँस जाता है ।
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