परमात्मप्राप्ति सरल है !
(पूज्य साँईंजी के ‘त्वमेकं शरण्यं’ सत्-साहित्य से संकलित)
परमात्मा की प्राप्ति वास्तव में बहुत सरल है और यह साधन कृपा के बल से, पुरूषार्थ से या परिश्रम से नहीं बल्कि उन्हीं की कृपा से होती है । चींटी अगर गरूड़ से मिलना चाहे तो कठिन है, इस जन्म में वो मिल पाये या नहीं यह कहना भी मुश्किल है, लेकिन गरूड़ अगर चाहे कि मुझे चींटी से मिलना है, तो यह आसान है । वह अपने विशाल पंखो के द्वारा, तीव्र गति के साथ चींटी से मिल सकता है । ठीक इसी प्रकार हम अपने साधन के, तपस्या के बल पर भगवान से मिलना चाहें तो कठिन है, उसमें मेहनत है और समय भी ज्यादा लगता है | किंतु भगवान कृपा करें तो उनकी प्राप्ति सहज में ही हो सकती है और भगवान की कृपा नित्य, अनवरत बरस ही रही है । भगवान ने खुद गीता में कहा है-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ।। (१५/७)
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है ।
जैसा बीज वैसा पौधा, जैसा पौधा वैसा बीज । बरगद के बीज से बरगद का वृक्ष ही बनेगा, आम की गुठली से आम का पेड़ ही बनेगा । जैसा मूल होगा, वैसा ही वृक्ष बनेगा । ठीक इसी प्रकार हम सबका मूल है भगवान । हम भगवान के अंश हैं, इस बात को पक्का मान लेना है, तो कल्याण अभी हो सकता है । शरीर का जन्म तो हो सकता है और उसकी मृत्यु भी होती है, किंतु वास्तव में जो हम हैं उसका न तो कभी जन्म हुआ है और न ही उसकी मृत्यु होती है । वह तो शाश्वत है, नित्य है, सनातन है । यही बात तुलसीदासजी ने रामायण में कही है :-
ईश्वर अंश जीव अविनाशी ।
चेतन अमल सहज सुख राशि ।।
शरीर संसार की धरोहर है और हम परमात्मा की धरोहर हैं । जो वास्तविक में हम हैं वो अबदल है और शरीर नित्य परिर्वतनशील है, यह बिल्कुल अनुभवयुक्त बात है । बचपन में जैसा शरीर था, वैसा आज नहीं है । जैसा आज दिख रहा, वैसा बुढ़ापे में नही रहेगा ? न चाहते हुए भी बदल रहा है, कितनी भी कोशिश करो उसे संभालने की, उसे टिकाने की पर वो टिकेगा नहीं । न चाहते हुए भी बीमार होता है, न चाहते हुए भी बाल सफेद हो जाते हैं । शरीर की संसार के साथ एकता है और हमारी परमात्मा के साथ एकता है, इस बात को हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए । जब हम रात को सो जाते हैं तब कुछ याद नहीं रहता – नाम, उम्र, पद, सब कुछ भूल जाते हैं । जब सुबह उठते हैं तो पहली क्षण जो अनुभव में आता है वह कौन है ? नाम, जाति, उम्र, यह सब तो बाद में आता है, पहली क्षण जो अनुभव में आता है वह तुम हो, वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है । शरीर है संसार का और तुम परमात्मा के । शरीर की संसार के साथ एकता हुई है । इस शरीर में जो गाढ़ापन है वो पृथ्वी तत्त्व है, जो गीलापन है, रक्त आदि वो जल तत्त्व है, जो जठराग्नि है, वो तेज तत्त्व का अंश है, शरीर में जो वात है, वो वायु का अंश है, पोलान है वो आकाश का अंश है | शरीर में रहे पंच तत्त्व प्रकृति के पंच तत्त्व का अंश है और वास्तविक में तुम जो हो वह अनश्वर है ।
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