सिस्टर लूसी के जीवन की एक झलक…
मातृवत्सल हृदय से दुःखितों की सेवा करनेवाली
सिस्टर लूसी के जीवन की एक झलक…
सिस्टर लूसी मानो मूर्तिमंत व्यापक मातृत्व ! ऐसा मातृत्व जो धर्म-भाषा-प्रदेश-जाति-पक्ष-पंथ किसी भी प्रकार के भेदभाव को मानता ही नहीं है । प्रेम, प्रेम और प्रेम ! निरुपाधिक प्रेम से, वात्सल्य से छलकता हुआ मातृत्व । केरल के एक छोटे से गाँव में सन् 1956 में लूसी का जन्म हुआ । 12 साल की उसकी उम्र थी, तब उसका पूरा परिवार केरल से मुंबई आकर बसा । वहाँ लूसी ने पहली बार झोपड़पट्टी देखी । खुले में शौचकर्म के लिए बैठी हुई बहनों को देखा । छोटे-छोटे बच्चों को भीख माँगते देखा । यह सारा नजारा देखकर उसे रातभर नींद नहीं आयी । क्यों, क्यों, क्यों ! इतनी गरीबी क्यों ? सोचते हुए पूरी रात बेचैनी में बीती । और उस बेचैनी ने भीतर गरीबों की सेवा करने का बीज बो दिया । लूसी ने एक बार मदर टेरेसा को देखा । उनके काम का आकर्षण हुआ । कुछ समय उनके ग्रुप के साथ काम भी किया । 17-18 साल की उम्र हुई । शादी के प्रस्ताव भी आने लगे । किंतु उसका कोई आकर्षण नहीं था । चित्त पर एकमात्र गरीबों की सेवा की धुन सवार थी । 20 साल की उम्र में लूसी ‘होली क्रॉस नन्स’ के साथ जुड़ी । करीब 12 साल वहाँ बिताये ।
भीतर सतत् कुछ चुभ रहा था । उसे तो गरीबों से भी गरीब की सेवा करनी थी । अंतरआत्मा की वह आवाज उसे चैन से बैठने नहीं दे रही थी । वह जो चाहती थी, उसे कॉन्वेन्ट की चार दिवारों के भीतर बैठकर नहीं कर सकती थी । उतने में एक प्रसंग बना । पास की झोपड़पट्टी से एक बहन उसके पास आयी । उसका पति उससे बहुत ही दुर्व्यवहार करता था । उसे पीटता था, सब प्रकार से हैरान करता था । उस बहन ने कहा, मैं घर जाना नहीं चाहती हूँ, आप मुझे आश्रय दीजिए । लूसी मजबूर थी, वह उस बहन को कॉन्वेन्ट में रख नहीं सकती थी । रोते-रोते वह लाचारी से घर लौटी । उसी रात को उसके पति ने उस पर केरोसिन डाला और आग लगा दी । वह रोती, चिल्लाती सड़क पर आ गयी । कौन चिल्लाता है देखने लूसी बाहर आयी तो वह बहन दौड़कर उसके पास आयी ‘मुझे बचाओ, मुझे बचाओ’ ! लूसी उसे अस्पताल ले गयी किंतु उसने रास्ते में ही प्राण छोड़ दिये । उस समय 7 माह का बच्चा उसके पेट में था । उस प्रसंग ने लूसी को भीतर से हिला दिया । वह जो चाहती थी, वह कर नहीं पा रही थी तो भीतर से कुछ फ्रस्ट्रेशन भी अनुभव कर रही थी । सद्भाग्य से उन्हीं दिनों उसे एक सहृदयी सज्जन मिले, फादर डीसोजा । एकदम खुले दिल-दिमाग के फादर ने उसे सलाह दी कि सबकी अनुकूलता की राह न देखते हुए तुम खुद ही अपने से काम शुरू कर दो । शुरू-शुरू में तो लूसी को फादर की बात पर विश्वास नहीं बैठा । यह सोच रही थी मैं एक स्त्री, जिसके पास न धन है, न शिक्षण । में दूसरों को मदद कैसे कर सकती हूँ ? तब फादर ने उसे कहा कि अगर तुम्हारे हृदय में प्रेम है तो तुम सबकुछ कर सकती हो । उस एक वाक्य ने उसे हिम्मत दी । उसने गाँव की बहनों के लिए काम करने का सोचा । कॉन्वेंट की ज्येष्ठ साधिकाओं ने सोचा कि लूसी पागल हो गयी है । वे कहने लगीं कि इस प्रकार का काम प्रारंभ करने के लिए खूब सारा धन चाहिए, ज्ञान चाहिए, लोग चाहिए । इसके अलावा इस प्रकार के काम में बहुत सारी झंझटें खड़ी होती हैं । उसे हल करना आसान बात नहीं है । लेकिन लूसी अपनी बात में पक्की थी । कॉन्वेन्ट में रहते उसे बारह साल हो गये थे । उसकी अंदर की चाह थी, गरीबों की सेवा करना । यह चाह दिन-ब-दिन तीव्र बनती चली थी । आखिर कॉन्वेन्ट की साथी बहनों ने लूसी की तीव्रता देखकर उसे गाँव में जाकर गरीबों को प्रत्यक्ष मदद करने की इजाजत दी । और लूसी गाँव में जाकर बहनों से मिलने लगी । उनके सुख-दुःख सुनने लगी । कैसी विषम परिस्थितियों से वे गुजर रही थीं, उनके साथ कैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था । ऐसी सारी कहानियाँ उसने पहले कभी सुनी नहीं थी । उनकी बात सुनकर वह कॉन्वेन्ट में आती थी और अपने आपको पूछती थी ऐसी परिस्थिति कैसे सही जा सकती है ? और फादर डीसोजा को पत्र द्वारा अपनी व्यथा बताती रहती थी । एक बार फादर डीसोजा जर्मनी गये थे । वहाँ उन्हें एक भाई ने कहा कि भारत में बहनों के बीच कोई काम करनेवाला हो तो मैं उन्हें मदद करना चाहूँगा और उन्होंने एक लाख रुपये का दान दिया ।
फादर ने वह रकम लूसी को भेज दी । उसे मिला हुआ वह पहला दान था । उसे पाकर उसे लगा मानो उसने जग जीत लिया और वह जमीन खोजने लगी । एक दूर के गाँव में छोटा-सा जमीन का टुकडा मिला । ‘माहेर’ (माँ का घर) के लिए जमीन का वह टुकड़ा अधिष्ठान बना । 20 बहनों से प्रारंभ करने का वह सोच रही थी । किंतु देखा कि बहनों के साथ उनके बच्चे अभिन्नरूप से जुडे रहते हैं । तो ‘माहेर’ में बच्चों का भी प्रवेश हुआ । और ‘माहेर’ पीड़ित, वंचित, तिरस्कृत बहनों और बच्चों के लिए आश्रयस्थान बना । 1997 में पूना के नजदीक एक गाँव में ‘माहेर’ का प्रथम होम (घर) बना, समाज से उपेक्षित बहनों और बच्चों के लिए आश्रयस्थान बना । उनके खाने-रहने की व्यवस्था के अलावा वहाँ उनको व्यावसायिक शिक्षण भी दिये जाने की योजना बनी, जिससे कि वे अपने पैर पर खड़े रह सकें । जिंदगी से थके-हारे लोगों में आत्मविश्वास जाग्रत हो, उसकी वहाँ फिक्र होती है । बच्चों को स्थानिक स्कूलों में भर्ती कराते हैं । उन्हें अच्छा खाना देते हैं, कला में, खेलकूद में वे आगे आयें उसका ख्याल रखते हैं । इसके अलावा सबसे अधिक ख्याल रहता है कि उन्हें निःस्वार्थ प्रेम मिले । ‘माहेर’ का सही मकसद तो वही है बच्चों को माँ की गोद मिले । ‘माहेर’ में लूसी का कमरा है । उस कमरे में तीन चारपाई है । एक लूसी के लिये है । दूसरी दो का क्या उपयोग? ‘माहेर’ का कोई भी बच्चा कभी भी आकर उन दो पलंगों पर सोना चाहे तो सो सकता है । कमरे का दरवाजा सदा खुला रहता है । वैसे लूसी बताती है कि बच्चों के साथ व्यवहार करना बड़ा कठिन काम है । अधिकतर रास्ते में भटकते हुए बच्चे यहाँ आते हैं। उनके पास संस्कार की कुछ पूंजी नहीं होती । उनकी भाषा, उनका बोलना सुनकर लगता है, कान बंद कर दें । उनको संभालना बड़ा कठिन जाता है । बड़ी हिम्मत और धैर्य का यह काम है । एक दिन एक जवान युवा मिलने आया । उसको नौकरी मिली थी और उसका प्रथम पगार वह ‘माहेर’ को भेंट देने आया था । उसने अपनी कहानी बतायी बहुत साल पहले वह रास्ते में भटकता रहता था । कई अनाथ आश्रमों में उसे आश्रय मिला । किंतु उसकी करतूत ऐसी थी कि वह कहीं भी टिक नहीं पाया । उसे कैसे संभाला जाये, यह बड़ा प्रश्न ही था । तो किसी ने कहा, उसे सिस्टर लूसी के पास भेज दो । वह उनके पास आया । यहाँ भी उसने सबको बहुत सताया । ‘माहेर’ के स्टाफ ने उसे कई बार मौका दिया । किंतु आखिर थककर उसे निकाल देने का ही सोचा । इस बीच एक दिन रसोईघर में जाकर उसने बड़ी समस्या खड़ी कर दी । किसी बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सबके लिए केक बना था । यह लड़का रसोईघर में गया और केक का काफी हिस्सा खुद ही खा गया । रसोई बनानेवाले और उसके बीच काफी कुछ गरमागरमी हो गयी और उस लड़के ने रसोइये को एक थप्पड़ लगा दी । ‘माहेर’ का पूरा स्टाफ लूसी के पास आया और कहने लगा कि आप अगर इस लड़के को नहीं निकाल देती हैं तो हम सब छोड़कर जाते हैं । लूसी ने कैसे भी उन्हें शांत किया । फिर वह उस लड़के को मिली । लड़के को लगा कि अब मुझे होम से बाहर निकाल देंगे । परंतु लूसी ने उसे अपनी बाहों में समा लिया और कहा, ‘मैं तुम्हें प्यार करती हूँ ।’ वैसे यह लड़का बड़ा ही टफ था, लेकिन लूसी के व्यवहार ने उसे रुला दिया । लूसी ने पूछा, तुमने जो किया वह ठीक था क्या ? उसने कहा, ‘ना’ । तो तुमने माफी माँगी क्या? ‘हाँ, किंतु उन्होंने सुना नहीं । इस तरह बातें चलीं और वह वहाँ कुछ समय रहा भी । अब कई सालों के बाद वह अपना पहला पगार लेकर आया था । उसने अपनी पूरी कहानी बतायी और कहा उस दिन अगर मुझे प्रेम अनुभव न आता तो मैंने सोच लिया या कि मैं आतंकवादी ग्रुप में शामिल हो जाऊंगा । वहाँ से बंदूक प्राप्त कर यहाँ के पूरे स्टाफ पर चलाऊंगा । किंतु सिस्टर लूसी ने कहा कि मैं तुम्हें प्यार करती हूँ और मेरे जीवन की राह बदल गयी । प्रेम की शक्ति अतुलनीय है । इस प्रसंग को लेकर सिस्टर लूसी ने कहा कि प्रेम की शक्ति शायद ही 100 प्रतिशत काम न भी करे तो भी इतने साल का अनुभव कहता है कि यह 99.99% निश्चित रूप से काम करती है । कोई भी आये, कैसे भी आये, लूसी के पास सबके लिए जगह थी । ‘माहेर’ का एक होम उसके लिए अब पर्याप्त नहीं बचा । उसका काम विस्तारित होता गया । शुरू में पुणे के आसपास के जिलों में और फिर महाराष्ट्र के बाहर केरल, कलकत्ता, झारखंड, कर्नाटक, आंध्र में भी ‘माहेर’ का काम फैलता गया । आगे चलकर यह कार्य बहनों और बच्चों तक सीमित नहीं रहा । सन् 2011 से परिवार द्वारा रास्ते पर छोड़े गये वृद्ध, अपाहिज, मानसकि रूप से अपंग पुरुषों के लिए भी नया होम खुला । ‘माहेर’ के प्रार्थना खंड में सभी धर्मों की पुस्तके रखी हुई हैं । संस्था का जो बैनर है, उस पर सब प्रमुख धर्मों के चिन्ह अंकित हैं । यहाँ बच्चों को शिक्षा दी जाती है कि कोई एक ही धर्म नहीं, सब धर्म हमारे हैं । सर्वधर्म समभाव को माननेवाली सिस्टर लूसी को वायनाड के कैथलिकों का काफी विरोध सहन करना पड़ा है । दूसरी ओर रोम में उसकी पोप फ्रांन्सिस से मुलाकात हुई । ‘गरीबों में भी गरीब’ की सेवा करनेवाली सिस्टर लूसी पर ऑस्ट्रेलिया में एक फिल्म भी बनी है । उस फिल्म का नाम है, ‘सिस्टर हार्ट’ । प्रतिष्ठित ‘कॉल 100’ ने उन्हें दुनिया के सबसे प्रेरणादायक लोगों की 2025 की वार्षिक सूची में 7वें स्थान पर रखा है । इस उपलब्धि ने भारत को वैश्विक मंच पर गौरवान्वित किया है और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को एक नयी पहचान दिलायी है ।